चंद लम्हें थे मिले,भींगी सुनहरी धूप में, हमने सोचा हँस के जी लें,जिन्दगानी फिर कहाँ
Saturday, July 8, 2017
Thursday, July 6, 2017
यूपी में नई सरकार -- (विनोद कुमार पांडेय )
उत्तर प्रदेश में जब सरकार बनी तो सभी को बहुत उम्मीद थी ,बहुत सारी उम्मीदों पर काम अच्छे से शुरू हुआ था पर पता नहीं क्यों आजकल स्पीड थोड़ी धीमी हो गयी है ,अपराध तो थमने का नाम नहीं ले रहा है और सारा सिस्टम सुस्त सा चल रहा है ,योगी जी काम करने में लगे हैं पर जमीनी स्तर पर कुछ दिख नहीं रहा है | हाँ प्रचार बहुत जोरदार चल रही है | ऐसी स्थिति में कवि निष्पक्ष होकर अपनी बात तो रखेगा ही ,मैंने भी कुछ लाइनें लिख डाली | आज आप सभी के नजर है | हास्य - व्यंग्य की स्थिति है,पर असली बात जो कहना चाहता हूँ ,वो भी साफ-साफ है | शायद मेरी बात योगी जी तक पहुँच जाये और उत्तर प्रदेश के विकास में रफ़्तार दिखाई दे |
Tuesday, July 4, 2017
राष्ट्रपति चुनाव में भी दांवपेंच की आजमाइश ---(विनोद कुमार पांडेय)
आज राष्ट्रपति चुनाव भी अखाड़ा हो गया है ,दांवपेंच की आजमाइश चरम पर है |जो रिंग के भीतर जाने वाला है ,वो इस खेल के बारे में बहुत कुछ नहीं जानता और बाहर बैठे उस्ताद दाँव में माहिर हैं | इन बाहर वालों की ही कलाकारी है कि कुछ पारम्परिक लड़ाकू अखाड़े में उतरने से पहले ही चित्त हो गए या कर चित्त कर दिए गए |
सब उस्ताद लोगों ने अपने-अपने समर्थित, पोषित एवं शोषित शीर्षस्थ लड़ाकू को अखाड़े में मिट्टी पोत कर उतार दिया है और वो स्वयं बाहर बैठ कर उम्मीदवार के सामाजिक गुणों की चर्चा करते हुए उसे परिणाम पूर्व ही विजेता घोषित करने पर तुले हैं | जिन्हें लड़ना है ,उनके चेहरे से उत्साह गायब है क्योंकि उनकी वास्तविक योग्यता को पीछे रखकर उन बातों पर जोर दिया जा रहा है जो सामाजिक अखंडता पर ठोकर मारता है |
राजनीति ऐसी थी पर राष्ट्रपति चुनाव ऐसा नहीं हुआ था,कौन सा राजनैतिक और व्यक्तिगत स्वार्थ है ? समझ से परे है | यह सिर्फ एक ईगो है वर्ना जो देश के सर्वोच्च पद पर बैठने वाला हो उसके चयन में मल्ल्युद्ध की क्या आवश्यकता है ? ,उसे तो निर्विवाद रूप से उस कुर्सी पर बैठना चाहिए क्योंकि वो भारत का प्रथम व्यक्ति है | वो सामाजिक कसौटी पर खरा उतरता तो हो पर जातीय और सम्र्पदाय से परे हो ,वह लोगों का आदर्श हो ,इस देश का आदर्श हो ताकि देश के इतिहास में उसका व्यक्तित्व सुरक्षित हो जाये और देश उसको कभी भूल न पाए |
--विनोद पांडेय
Sunday, July 2, 2017
ट्यूबलाइट ---(विनोद कुमार पांडेय )
नाच मेरी जान होके मगन तू,छोड़ के सारे किन्तु परन्तु , आज जैसे ही ट्यूबलाइट का यह दार्शनिक गाना कान में पड़ा वैसे ही दिमाग के सारे तार झनझना गए ,झनझनाये इस बात पर कि जाने क्यों आजकल सब लोग नाचने-नचाने के पीछे बड़े जोर-शोर से पड़े हैं ,और इस गाने में तो गीतकार महोदय ने साफ-साफ़ इस बात की ओर इंगित किया कि आज के टाइम में नाचना ही मोक्ष का द्वार है ,समस्त चिंताओं का नाश है | मानो गाना न हो गया कोई गीता का सार हो |
जमाना बदला,लोग बदले तो बात भी बदल गयी और बात कहने का तरीका भी | कभी एक जमाना था जब राजेश खन्ना जी बोले थे कि नाच मेरी बुलबुल तुझे पैसा मिलेगा ,और आज जब लोग पैसे के पीछे जमकर उछल कूद कर रहे हैं तब सलमान खान जी मुफ्त में नाचने की बात कर रहे हैं,वो भी बेशर्म होकर | ऐसा कह कर उन्होंने राजेश खन्ना जी का भी सारा गणित ख़राब कर दिया |कमर मटकाने की महिमा का वर्णन ऐसे किया जैसे जिंदगी में नाचना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य हो और इससे इतर बाकि कुछ माया मोह |
खैर इस आधुनिक युग में कुछ भी जरा जोर लगा कर कह दो तो चल जाता है ,गाना हिट है ,लोग झूम नाच रहे हैं ,आगे और भी झूमने वाले लोग निकल-निकल कर आएंगे |कुछ दिनों पहले जो लोग भैस चराने गए थे इस बार वो भी नाचते हुए मिलेंगे | अद्भुत शक्ति होती है ऐसे गानों में | वैसे भी चटपटे गानों पर नींबू डाल कर बेच देने में सलमान खान को महारत हासिल है और आधा भारत उनकी इस नैसर्गिक प्रतिभा का भयंकर कायल है |
सभी ने देख ही लिया है कि बजरंगी भाईजान कैसे अखाड़े में दंड बैठकी मार कर सुल्तान बन गया था ,पर ट्यूबलाइट सुल्तान की जिंदगी में रोशनी नहीं कर पायी फिर भी वो लोग किन्तु-परन्तु छोड़ कर नाच सकते हैं ,जो सलमान खान के भक्त हैं |
--विनोद पांडेय
Friday, June 30, 2017
ओ बादल,क्या आना तेरा झलक दिखा कर चले गए --(विनोद कुमार पांडेय )
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
सालों गुजर गए एक वो समय हुआ करता था जब ब्लॉग से नजर नहीं हटती थी ,सुबह-शाम ब्लॉग लिखने और पढ़ने का जो भूत सवार था वो फेसबुक के आने के बाद धीरे -धीरे कम होता गया,हमारे जैसे बहुत से लोग लिखते-पढ़ते रहे पर वो लय नहीं बन पायी | परन्तु बेहद खास बात रही कि ब्लॉग के दोस्त बिछुड़ने नहीं पाए और शायद इसी खास वजह से आज हम फिर संगठित होकर
सालों गुजर गए एक वो समय हुआ करता था जब ब्लॉग से नजर नहीं हटती थी ,सुबह-शाम ब्लॉग लिखने और पढ़ने का जो भूत सवार था वो फेसबुक के आने के बाद धीरे -धीरे कम होता गया,हमारे जैसे बहुत से लोग लिखते-पढ़ते रहे पर वो लय नहीं बन पायी | परन्तु बेहद खास बात रही कि ब्लॉग के दोस्त बिछुड़ने नहीं पाए और शायद इसी खास वजह से आज हम फिर संगठित होकर
#हिन्दी ब्लॉगिंग के लिए आगे आये हैं | सभी मित्रों का पुनः स्वागत है ,एक बार फिर से सब मिलकर साथ चले और हिन्दी ब्लॉगिंग को एक और नया मुकाम दें |
आज इस नए कदम का स्वागत करते हुए ,एक कविता से ब्लॉगर्स डे को मानना चाहता हूँ ,बरसात हो रही है और नहीं भी हो रही है ,ऐसे मौसम में भाव उपजा है तो आप सभी के सम्मुख रह रहा हूँ | सभी ब्लॉगर्स मित्रों को अन्तर्राष्ट्रीय ब्लॉगर्स डे की बहुत बहुत बधाई |
ओ बादल,क्या आना तेरा झलक दिखा कर चले गए
हम बैठे थे आस लगाए तुम तरसा कर चले गए
तुमको देखा मन हरषाया
प्यास दबी थी उसे जगाया
सूखे सावन में तड़पा था
जो दिल उसने शोर मचाया
लेकिन तुम कुछ समझ न पाए आग लगा कर चले गए । हम बैठे थे .....
क्या है प्रेम समझ पाते तुम
थोड़ी देर ठहर जाते तुम
धरती भी हँस लेती थोड़ी
काश जरा सा मुस्काते तुम
पहले से उदास बैठी थी उसे रुला कर चले गए । हम बैठे थे .....
बहुत खुश हुए थे किसान भी
झुके हुए तन गए धान भी
तुम्हें देखकर लगे झूमने
बूढ़े ,बच्चें और जवान भी
लगता था बरसोगे लेकिन बस भरमा कर चले गए । हम बैठे थे .....
कलियों ने खुशबू बिखरायी
तुमको खुशबू रास न आयी
बिजली रानी तड़प-तड़प के,
अपने दिल की व्यथा सुनाई,
शायद सब के सब प्यासे थे तुम तड़पा के चले गये । हम बैठे थे .....
नदियाँ खाली पड़ी हुई थी
आँखे तुम्ही पर गड़ी हुई थी
हाथ उठा कर तुमको पाने ,
सारी बस्ती खड़ी हुई थी
तुमने फिर निराश कर डाला ख्वाब दिखा कर चले गए । हम बैठे थे .....
आ जाओ फिर इंतजार है
तुमसे ही जग में बहार है
अबकी थोड़ी देर ठहरना
प्यासी धरती बेकरार है
नदी,फूल,हम सब प्यासे हैं तुम इठला कर चले गए । हम बैठे थे .....
--विनोद पांडेय
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