Tuesday, August 15, 2017

टॉयलेट - एक प्रेम कथा



टॉयलेट ,मैंने भी देख ली | साफ-सुथरी है | थोड़ा बहुत कूड़ा- करकट तो मंदिरों के आस-पास भी पाया जाता है ,इसलिए टॉयलेट में अधिक सफाई की उम्मीद करना बेमानी होगा | आप देशभक्त हैं ,तो टॉयलेट देखने में मजा आएगा ,आप मोदी भक्त हैं तो टॉयलेट देखने का आनंद दोगुना हो जायेगा |यदि आप पुराने रूढ़िवादिता ,अन्धविश्वास से नफरत करते हैं तो टिकट का पैसा वसूल होता महसूस करेंगे ,कुछ सीन में आप गुदगुदी का अनुभव करेंगे ,कुछ में आपको गुस्सा आएगा | हाँ यदि आप लोटा से प्रेम करते हैं तो बहुत निराशा होगी क्योंकि लोटा बार बार खूब पटका गया है ,फिल्म में लोटे की भयंकर बेइज्जती की गयी है |

मुद्दे की बात करें तो सारांश यही है कि अगर आपके घर में टॉयलेट नहीं है और आपके बाबूजी पुराने सोच वाले जिद्दी इंसान है तो पढ़ी लिखी लड़की से शादी करने का विचार त्याग दीजिये वरना पापड़ बेलने के लिए तैयार रहिये | फिल्म आपको शिक्षा देती है ,ऐसी परिस्थिति में पहले बाबूजी को समझा कर घर में टॉयलेट बनवायें फिर शादी करें वरना यही काम बाद में करना पड़ेगा तो पसीने छूट जायेंगे जैसा अक्षय कुमार को इस फिल्म में छूट रहा था | अक्षय ऐसी ही एक गलती कर बैठते हैं ,उनकी पत्नी भूमि को बाहर टॉयलेट जाना पसंद नहीं है और अक्षय के बाबू जी घर में संडास बनवाने के लिए राजी नहीं हैं | यही मामला तूल पकड़ता है और कहानी आगे बढ़ती है | 

फिल्म की कहानी में थोड़ा बहुत लोचा है मगर चलता है क्योंकि बिना मसाले के अचार नहीं बनता है |एक पति का पूरा फोकस अपनी नवविवाहिता बीवी को टॉयलेट करवाने पर ही रहता है ,पूरा प्यार इसी टॉयलेट के इर्द-गिर्द घूमता है |इसमें खूब प्यार दिखाई देता है ,इसलिए एक प्रेमकथा टाइटल बना कर जोड़ दिया गया है | अक्षय कुमार बहुत हाथ पैर मारते हैं कि मामला सुलझ जाये लेकिन उनकी बीवी मोदी जी बहुत बड़ी भक्त निकलती हैं और जिसके लिए उन्हें आने वाले टाइम में कोई अवार्ड भी मिल जाए तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं होगी| भूमि पेडनेकर ने बहुत बढ़िया एक्टिंग की है ,टॉयलेट न होने पर तलाक की बात करना मुझे इसलिए भी सही लगता है क्योंकि आजकल तो पढ़ी-लिखी लड़कियाँ बिना बात के तलाक ले लेती हैं ,यहाँ तो फिर भी कुछ पेंच वाली बात है |कहानी आगे बढ़ती है , ट्रैन में टॉयलेट के समय ट्रैन का नाटकीय ढंग से छूट जाना उनके जिद को और मजबूत कर देता है कि ससुराल में जब तक टॉयलेट नहीं बनेगा वो वहां नहीं जाएगी | अक्षय कुमार के पिताजी सुधीर पांडे ,पक्के पंडित और पुराने विचार वाले ठहरे सो उनकी भी अपनी जिद है कि बहु टॉयलेट बाहर ही जाएगी ,घर में नहीं बनेगा | अंत में तलाक की नौबत आ जाती है ,फिर ह्रदय परिवर्तन होता है | इसी बीच अक्षय कुमार की भागदौड़ से सरकार भी हिल जाती है मतलब कहानी में भ्रष्टाचार को भी जोड़ा जाता है और नोटबंदी का भी नाम लिया जाता है | भूमि के आंदोलन की चर्चा मीडिया में आती है ,गाँव की और भी औरतें लोटा छोड़कर इस आंदोलन से जुड़ती हैं ,मीडिया और तूल देता है ,लोटा पटका जाता है ,लोगों के घरों में भी विवाद होता है ,औरतें बाहर जाने से इंकार कर देती हैं और फिर सरकार हिल जाती है | अदालत में तलाक से ठीक पहले मुख्यमंत्री जी का लेटर भी आ जाता है और तलाक रुक जाता है ,पंडित जी का ह्रदय परिवर्तन हो जाता है और घर में ही नित्यकर्म का सारा अरेंजमेंट करवा देते हैं | फिल्म टॉयलेट के साथ सेल्फी पर ख़त्म हो जाती है |

फिल्म में अक्षय कुमार और भूमि के साथ साथ अक्षय के भाई के रोल में दिव्येंदु ने बेहद शानदार अभिनय किया है ,अभिनय के मामले में सुधीर पाण्डे जब जब स्क्रीन पर दिखाई देते हैं ,कमाल ही करते हैं | ससुर और पिता के रोल में उनका किरदार डराने वाला रहता है पर अंत भला तो सब भला | अनुपम खेर को ज्यादा काम नहीं मिला है ,डाउट होता है कि शायद स्वच्छता मिशन के इस फिल्म का हिस्सा वो जान बूझकर होना चाहते थे | उनका किरदार ठूसा गया था ,लेकिन जितना भी रोल मिला उन्होंने हमेशा की तरह प्रभावित किया | बाकि फिल्म के डाइरेक्टर नारायण सिंह जी ने हर कलाकार से फ़ीस के बराबर ठीक-ठीक काम करा लिया |

वैसे तो अक्षय कुमार प्रोफेशनल अभिनेता है मगर इस फिल्म में उन्होंने सरकार की थोड़ी बहुत चापलूसी की है,जो साफ-साफ दिखाई पड़ता है |अक्षय कुमार और अनुपम खेर राष्ट्रवाद के ट्रैक पर सरकार के स्वच्छता मिशन के झंडे को लेकर दौड़ते हुए अच्छे लग रहे थे | गाँधी जी के चश्में से देखने पर मै इस फिल्म को पाँच में से साढ़े तीन नंबर देना पसंद करूँगा | अगर स्वच्छता अभियान वाला चश्मा आप भी पहन कर जाये तो मजा आएगा | वैसे एक बार यह फिल्म सभी को देखनी चाहिए ,खासकर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में तो सरकार को यह फिल्म गाँव के लोटाप्रेमी पुरुष और महिलाओं को पकड़-पकड़ कर दिखवाने का भी कुछ प्रबंध करना चाहिए | अगर अक्षय कुमार और अनुपम खेर ने सरकार के मिशन को टॉयलेट के जरिये मजबूती देने का प्रयास किया है तो सरकार भी उनको मजबूती प्रदान करे |
--विनोद पांडेय

Saturday, July 29, 2017

टमाटर


खा रहें हैं जो टमाटर आजकल,दायरे में टैक्स के वो आएँगे
पी रहे हैं जो टमाटर जूस उनके, घर पे छापे जल्द मारे जायेंगे
जिस कवि को बस लिफाफा ही मिला,वो बहुत हल्का कवि कहलायेगा
जिस कवि पर खूब बरसेगा टमाटर, राष्ट्रीय कवि वो ही माना जायेगा





--विनोद पांडेय

Saturday, July 8, 2017

गुरु जी की जय --(विनोद कुमार पांडेय )

सभी गुरुओं को नमन करते हुए एक आधुनिक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ | पढियेगा और अपना आशीर्वाद दीजियेगा | 


हुए नदारद प्रेम समर्पण,बदलें गुरु शिष्य के नाते,
द्रोणाचार्य अगर होते तो,इसे देख कर मर ही जाते 

अर्जुन कभी हुआ करते थे 
गुरु की बात सुना करते थे 
आज शिष्य भी बदल गए हैं 
गुरु से आगे निकल गए हैं 
इस नवयुग की बेला में ,
रेलम,ठेलम-ठेला में ,
भाग रहे सब इधर उधर,
कहाँ गुरु और शिष्य किधर,
कौन करे अंगुली का दान,
एकलव्य सा कौन महान,
आज गुरु की कॉलर पकड़े,शिष्य बहादुर हैं गरियाते,
द्रोणाचार्य अगर होते तो,इसे देख कर मर ही जाते 

गुरुजी का भी  हाल अनोखा 
हींग फिटकरी बिन रंग चोखा 
धन से मालामाल हो रहे 
गुरु से गुरु घंटाल हो रहे  
कुछ तो केवल फर्ज निभाते 
बस विद्यालय आते जाते 
माना उनको ज्ञान बहुत है 
पर ट्यूशन पर ध्यान बहुत है 
कुछ मेहनत करके थक जाते 
लेकिन कुछ बस मौज उड़ाते 

और परीक्षा में बच्चों को नक़ल कराके पास कराते 
द्रोणाचार्य अगर होते तो,इसे देखते ही मर जाते.

बदल रही है दुनिया सारी 
सिर्फ मची है मारा मारी 
शिष्य गुरु सब हुए आधुनिक 
और पढाई धिन -चिक,धिन-चिक  
शिक्षा,शिक्षक सब में झोल,
जैसे ढोल के अंदर पोल,
रुपये के अधिकार में हैं 
शिक्षा अब बाजार में है,
लोग लगाते दाम यहीं,
कुछ लोगों का काम यही,

विद्या अर्थ भूल करके वो ,विद्या से बस अर्थ कमाते,
द्रोणाचार्य अगर होते तो,इसे देखते ही मर जाते.

जैसा पहले हम सुनते थे 
सुन कर के मन में गुनते थे 
वैसे गुरु शिष्य अब कम है 
सोच-सोच कर आँखें नम है  
गुरु शिष्य का प्रेम,समर्पण,
ख़त्म हुआ अब वो आकर्षण,
परिवर्तन का चढ़ा असर 
शिष्य बनाया गुरु पर डर  
क्षीण हुए गुरु के अधिकार,
आख़िर हो कर गुरु लाचार,
रख कर के बंदूक जेब में,शिक्षक कक्षा में अब जाते ,
द्रोणाचार्य अगर होते तो,इसे देखते ही मर जाते.

लालू यादव जी और घोटाला -- (विनोद कुमार पांडेय )



आज के ज़माने में दस बच्चों को पाल-पोष कर बड़ा करना ,इतना आसान नहीं है | रिस्क तो लेना ही पड़ता है