Monday, September 26, 2016

चिकनगुनिया ----(विनोद कुमार पांडेय )

चिकनगुनिया चिकनगुनिया चिकनगुनिया चिकनगुनिया
इधर भी है ,उधर भी है जिधर देखो चिकनगुनिया

गयी बरसात जब से है कहर ढाने लगे मच्छर,

लगे बीमार होने सब सभी को भा रहा बिस्तर,
किसी की नाक सूजी किसी का होंठ सूजा है,
किसी की खोपड़ी ऐसे दिखती जैसे खरबूजा है,

कोई भी बच न पाया चाहे पाठक हो चाहे पुनिया | चिकनगुनिया चिकनगुनिया....


किसी की टाँगे अकड़ी है किसी को दर्द है भारी,
दवाई बेअसर लगती हुई ऐसी महामारी,
जाँच पर जांच होता है मगर कुछ भी नहीं मिलता,
कमाई इतनी है कि डॉक्टरों का तोंद है हिलता,

बड़ी आबाद दिखती डॅाक्टरों की आजकल दुनिया | चिकनगुनिया चिकनगुनिया....

पड़ोसी के दुखों में कल मजे लेते मिले दूबे ,
सुबह देखा तो चड्ढा क्लिनिक पर लेटे मिले गुप्ता,
उधर दूबाईन के घुटने में रह रह दर्द होता है,
देख यह सब मोहल्ले केअधेड़ो का दिल रोता है,

पड़े हैं ओढ़ के चादर इधर लल्ला उधर मुनिया | चिकनगुनिया चिकनगुनिया....

नहीं कर पा रहा है कुछ प्रशासन देखता रहता,
मुझे वो भी चिकनगुनिया के झांसे में फँसा लगता,
बड़े अधिकारियों के घर भी हावी हैं बड़े मच्छर,
जरा देखो लगाते है निरंतर डॉक्टर चक्कर,

जो रसगुल्ला के जैसा था वहीं अब बन गया बुनिया |
चिकनगुनिया चिकनगुनिया चिकनगुनिया चिकनगुनिया
इधर भी है ,उधर भी है जिधर देखो चिकनगुनिया |

Saturday, June 11, 2016

विनोद पांडेय की हास्य-व्यंग्य कविता/छन्द की रिकार्डिंग नोएडा के ग्रीन स्टूडियो में (कवि सम्मलेन) ------विनोद कुमार पांडेय





नोएडा के ग्रीन स्टूडियो में हास्य-व्यंग्य युवा कवि विनोद पांडेय के कविताओं की रिकॉर्डिंग हुई जिसमे अन्य श्रेष्ठ युवा कवि भी साथ में थे ।सामाजिक परिस्थतियों पर व्यंग्य कविता में मेरा सबसे श्रेष्ठ विषय है । मैंने कहने की कोशिश की यदि भगवान् श्रीकृष्ण जी इस युग में पृथ्वी पर आते तो क्या होता । मथुरा का जो आज हाल है ,गोकुल का आज जो हाल है या यूँ कहे पुरे देश का कलयुग में आज जो हाल है उसमे भगवान का मानवीय चित्रण करते हुए कुछ छन्द पढ़े हैं । हास्य कविता का वह रूप जो बिलकुल शालीन एवं श्लिष्ट है ,आपको अच्छा लगेगा ,आपको गुदगुदाएगा और आपको सोचने पर भी विवश कर देगा । समय निकाल कर देखिये,आपकी प्रतिक्रिया इस युवा कवि का हौसला बढ़ाएगी । आप सभी का अग्रिम धन्यवाद । 


Friday, February 12, 2016

लव का महीना - व्यंग्य -----(विनोद कुमार पाण्डेय)

जो लोग कहते हैं कि प्यार का कोई समय,दिन,महीना नही होता है,वही लोग फ़रवरी में कुछ अधिक फुदकते हैं लाजमी है फ़रवरी के चौदह तारीख का महत्त्व उनके लिए ठीक वैसा ही होता है जैसे जुआरियों के लिए दिवाली,क्योंकि सब फ़िराक का मामला है जैसे जुआरी फ़िराक में चैबीस घंटे रहते हैं ,मौका मिलते ही खेल लेते है ,हार जाते हैं ,जीत जाते हैं ,पकड़े जाते हैं ,कूटे जाते हैं,छूट जाते हैं पर दीवाली पर जुआ खेलने की अधिकारिक मान्यता होने की की दलील देते हैं कुछ कुछ वैसी ही प्रेम की कहानी है ख़ुशी और गम दोनों जगह है  संतोष दोनों जगह नही है हाँ प्रेम दिवस वेलेंटाइन जी के याद में मनाते है पर अगर वो जिन्दा होते तो धन्य हो जाते कि उनको याद करने वाले कितने और कैसे-कैसे लोग हैं ।जिस धरती पर सिर्फ बात कर लेने भर से गोली चल जाती है उस धरती पर बेचारे प्रेमी कैसी-कैसी यातनाएँ झेल कर भी उनको याद करते हैं और इस दिन को महोत्सव में बदल देते हैं  

इस लव के महीने में बहुत कुछ बदलता है ।पहले कम था अब ज्यादा बदलने लगा है प्यार में स्थायित्वता प्राप्त कर चुके लोग अपने सच्चे प्यार का सबूत देते हैं और कुछ नवोदित अपना भाग्य आजमाते हैं ।कुछ सफल होते हैं ,कुछ की कुटाई होती है कुछ मुस्कुराते हैं ,कुछ रोते हैं कुछ की बांछे खिल जाती है ,कुछ मुँह छिपाते फिरते है सब लव के महीने में होता है। हाँ एक बात जो निकल के आती है वो यह कि प्रेमी बड़े हिम्मती होते हैं धैर्यवान होते हैं ।कभी-कभी उन्हें देश की संस्कृति के विपरीत कार्य करने का विरोध भी झेलना पड़ता है ,पर हँस कर झेल लेते हैं कभी-कभी प्रेम दिवस मनाने के चक्कर में संस्कृति के कुछ ठेकेदारों द्वारा धरे भी जाते है ,पर बहादुरी से सामना करते हैं कभी-कभी परिवार वालों के सामने कान पकड़ कर उठक-बैठक भी करना पड़ता है ,पर हँसते हँसते सब सह जाते हैं ।इससे उनकी  बहादुरी एवं प्रेम के प्रति समर्पण व्यक्त होता है यह सब लव के महीने में अधिक होता है  

जैसे ही फ़रवरी का महीना शुरू होता है ,प्यार करने वाले लोग और प्यार की शुरुआत करने वाले लोग योजना में लग जाते हैं ।प्रेम करने वाला कंजूस हो या खर्च करने वाला,इस माह में सभी के दिल खुल जाते है ,जेब खाली हो जाता है ,खाली नही होता है तो खाली करवा लिया जाता है क्योंकि प्रेम ही सब कुछ है ।प्रेम शाश्वत है प्रेम के बिना जीवन सूना है   

हमारे एक मित्र हैं शर्मा जी हैं तो कंजूस टाइप के पर बड़ी धूमधाम से इस उत्सव की तैयारी करते हैं उनका अपना तरीका है क्योंकि वो बड़े दिलवाले हैं ।इस महोत्सव में वो तीन-चार लोगों को उपहार देते हैं ।अभी जनवरी से ही वो गिफ्ट खरीदने में लग गए  मैंने पूछा कि भाईसाहब इतनी जल्दी क्या है तो उन्होंने बताया कि अभी ऑफ़ सीजन चल रहा है ,गिफ्ट थोड़ा सस्ते में जायेगा ।मुझे भी उनकी बात ठीक लगी और सोचा यदि इनके पास बाग़ होता तो शायद दिसंबर से ही फूलों की खेती शुरू कर देते ताकि गुलदस्ते भी सस्ते में निपट जाये यह तो मज़बूरी है कि गुलदस्ते उसी दिन लेना पड़ेगा कम्बक्ख्त ये फूल भी बड़े जल्दी मुरझा जाते हैं   


हमारे एक और मित्र है यादव जी ,वो भी बड़े दिलवाले हैं साथ ही साथ बड़े भोले भी हैं  कई साल से एक ही प्रेमिका है,लव के महीने में खूब खर्च करते हैं अतः प्रेमिका ने उन्हें बदलना उचित नही समझा मैंने उनसे भी पूछा आप कि आप इतना क्यों लुटाते हैं तो वो तो भड़क ही गए क्योंकि वो बड़े भोले हैं मेरे प्रश्न से उनके भावुक दिल को कहीं चोट सी लगी  फिर एक बढ़िया वाला लेक्चर दिए,जो लगभग लगभग हर आध्यात्मिक आशिकों की जुबाँ पर होता है कहने लगे भाई दुनिया में प्रेम ही तो है ,हम प्रेम करते हैं तो इसे सार्वजानिक स्वीकार करने में ,मनाने में ,यादगार बनाने में ,उपहार देने में क्या हर्ज़ है  इस संसार में प्रेम से बढ़कर कुछ नही है पैसा हम खर्च करने के लिए ही कमाते है ,पैसा आता है चला जाता है ,इसलिए  प्रेम के नाम पर थोड़ा बहुत खर्च करने में कोई बुराई नही है उनकी बातों से मुझे भी एह्साह हुआ कि वो  ठीक ही कह रहें है। केवल  खर्च करना ही क्या है ,जब प्रेम इतना महान है तो उसमे बर्बाद होने में भी कोई बुराई नही है प्रेम का ही इतिहास रहा है ।जयसिंह से लेकर मंजनू तक ,चाँद मोहम्मद से लेकर मटुकनाथ तक प्रेम का इतिहास रहा है  


सब की बात सुन-सुना कर मुझे लगने लगा कि इस लव के महीने में भी मेरा ह्रदय इतना शुष्क क्यों  है फिर अपने अतीत पर नजर डाला तो भी कुछ नही मिला ।हाँ कॉलेज में एक लड़का था सुरेश ,उसने इस पर्व को मनाने की असफल कोशिश की थी असफल इसलिए कि चौदह फ़रवरी से लेकर चौदह मार्च तक अस्पताल में रहा दरअसल जिसे उसने फूल दिया उसके फूल जैसे भाइयों की नजर सुरेश पर पड़ गयी बाकी का क्या हुआ आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है  हाँ पर इंसानियत बची है इस बात का उदहारण रहा कि लड़की के भाइयों से पीटने के बाद सुरेश के लिए तुरंत एम्बुलेंस की व्यवस्था करा दी गयी थी वर्ना हादसा और बड़ा भी हो सकता था इस घटना से हमको लगा कि प्यार-वार रिस्की लोगों के लिए है तभी से लव का महीना शुष्क ही अच्छा लगता है सबकी अपनी अपनी भावनाएं होती है ,मै कमजोर दिल का था तो मेरे लिए कुछ नही पर सबके लिए तो बहुत कुछ है  



ऐसा नही कि इस महीने में कुँवारे लोग ही व्यस्त रहते हैं ,शादीशुदा व्यक्तियों के लिए भी यह माह महत्वपूर्ण है   जो लोग इस प्रेम दिवस को नही मनाते उन्हें , मन ही मन में समाज में पिछड़ जाने का दंश सहना पड़ता है क्योंकि यह त्यौहार विदेश से आया है,इसका अपना स्टेटस हैबड़े लोग मनाते है ,पैसे वाले लोग मनाते है। हीनभावना उपजे इसलिए भी बहुत से लोग छुप-छुपा कर प्रेम दिवस मनाते हैं,उपहार देते हैं,गाना गाते हैं ,डांस करते हैं ,पार्टी करते हैं  

मामला चाहे प्रेम के प्रदर्शन का हो या उपहार देने का ,मनाना पड़ता है पिछले साल हमारी कालोनी में शम्भू की पत्नी ने प्रेम दिवस पर शम्भू को उपहार दे दिया,उसकी पहले से तैयारी नही थी अब बेचारा साल भर सुनता रहा,उसका अपना ह्रदय भी बहुत कटोचता रहा कि प्रेम में पीछे रह गया  इस बार ह्रदय को कठोर करके इस उत्सव में अपना योगदान देने का निश्चय किया है ऐसा नही कि अगला प्रेम नही करता पर गिफ्ट खरीदते समय कभी कभी  प्रेम की जगह पैसा जाता है राजकुमार के बच्चे कान्वेंट स्कूल में पढ़ते हैं ,उनके यहाँ तो इसे धार्मिक उत्सव जैसा मनाते हैं ।धूमधाम से मनाते हैं ।राजकुमार को पता नही चलता पर जेब तो उसकी ही ढीली होती है    

कुछ मिलाजुला कर फ़रवरी महीने में प्रेम एक हलचल जैसा उमड़ता है, जो प्रेम करते हैं उनके दिलों में भी और जो नही करते हैं उनके दिलों में भी ।पूरे सप्ताह भर का कार्यक्रम होता है पर दिल पूरे महीने धड़कता है प्रेमियों का दिल धड़कना भी चाहिए ,जिसका नही धड़का वो प्रेमी कैसा फ़रवरी में हलचल स्वाभाविक है क्योंकि प्रेम एक बेशकीमती तोहफा है  धन की चिंता किये बिना प्रेम दिवस मनाना चाहिए ,मान-सम्मान की चिंता किये बिना प्रेम दिवस मनाना चाहिए,चाहे जेब ढीली हो ,चाहे उल्लू ही बन रहे हो , चाहे जूते ही क्यों पड़े प्रेम का एहसास ह्रदय में बना रहना चाहिए प्रेम के इस त्यौहार में जरा भी चूक नही होनी चाहिए याद रखें कुछ रहे रहे प्रेम सदा रहेगा ।प्रेम शाश्वत है  

(विनोद कुमार पाण्डेय)