Wednesday, December 23, 2009

अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-1

पल्स पोलियो की तरह,खूब चला अभियान,

घर घर चन्दा माँगने, चल देते श्रीमान,


मंदिर के निर्माण में,लगा दिए जी-जान,

त्याग के गुलछर्रे देखो,वो माँग रहे हैं दान,


भारत की भावी पीढ़ी,खुद से है अंजान,

चौराहे पर हा-हा,ही-ही, यही बनी पहचान,


घर में बीवी लतियाए,बाहर है झूठी शान,

चूरन बेच रहे बाबू जी,लड़का हुआ प्रधान,


देख के भक्तों की भक्ति,हैरत में भगवान,

नज़रें मूर्ति पर है लेकिन,जूता पर है ध्यान,


पैसे के आगे नतमस्तक,पर्वत सा ईमान,

भौतिकता के युग में प्यारे, ठेले पर इंसान,


Tuesday, December 15, 2009

राखी के स्वयंबर में सलामत दूबे जी..एक हास्य भरी काल्पनिक प्रस्तुति

दोस्तो. हँसने-हँसाने का दौर जारी रखते हुए आज एक और रचना आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ कविता का आधार महज कल्पना है और मनोरंजन के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ इस उम्मीद के साथ की इस कहानी के पात्र यदि कहीं होंगे भी तो अन्यथा नही लेंगे...धन्यवाद

राखी का स्वयंवर,

अयोध्या से भी गये थे एक वर,

क्योंकि,अब भी वहाँ के लोगों को ये यकीं है,

कि स्वयंवर-व्यमवर के मामले में,

अयोध्यावासी थोड़े लकी हैं,


बस फिर क्या एक थे,

राखी के प्यार में डूबे,

नाम था जिनका सलामत दूबे,

उछलते-कूदते किस्मत के सहारे,

स्वयंवर वाले स्टूडियो में इंट्री मारे,


मत पूछिए जनाब कितने खुश थे,

जैसे इराक़ जीतने के बाद वाले जार्ज बुश थे,

गये,सोफे पर बैठे ही थे,कि राखी जी आईं,

इन्हे देखी और मुस्कुराई,

ये भी मुस्कुराहट का रिएक्सन जताने लगे,

और पागलों की तरह ज़ोर ज़ोर,

ठहाके लगाने लगे,

थोड़ा करीब डोले,और चुटकी

लेते हुए बोले,

राखी जी,आपको हमने

अलग अलग वेश में देखा,

पर पहली बार आज फुल ड्रेस में देखा,

यह तुम खुद सिलाई हो,

या किसी से माँग कर लाई हो,


राखी झल्लाई पर खुद को संभाली,

एक भी फूटकर गाली मुँह से नही निकाली,

सीरियस रोल में हो ली,

और बहुत कंट्रोल कर के बोली,दूबे जी,

आप तो बड़े ही मजाकिया टाइप के है,

आइए,बैठिए,कुछ बात आगे बढ़ाते है,

और फिर आपको औकात में लाते हैं,

बताइए कैसे हालात है,

और मेरे बारे में आपके क्या जज़्बात है,


इतना सुनते ही दूबे जी,

भावनाओं में डूब गये,

खूब बहकनें लगे,

बातें बना बना कर कहने लगे,

कि राखी बचपन से तुम्हारे प्यार में पड़ा हूँ,

तुम्हारे प्यार के सहारे यहाँ जिंदा खड़ा हूँ,

आगे भी सहारा दो नही बैठ जाऊँगा,

यही सोफे पर पड़े पड़े ही ऐठ जाऊँगा,

तारीफ़ सुनकर राखी भी बड़ी खुश

जैसे लग रही थी,

वो भी कुछ लारा बुश जैसे लग रही थी,

खूब मज़े से दूबे जी बात सुनी,

फिर मुस्कुरा कर बोली,

दूबे जी सचमुच में आप भावनाओं से

भरे पड़े हैं,

पर एक समस्या है,वो ये कि

आप के बाल बहुत बड़े हैं,

मुझे बालो से कंगाल चाहिए,

वर चाहिए पर बिना बाल चाहिए,

वैसे भी शादी अभी कर नही सकती,

मजबूरी है,

प्रोग्राम की टी. आर. पी. बढ़ाना भी तो,

बहुत ज़रूरी है,

इसलिए अभी तो आप जाइए,

घर जाकर भजन कीर्तन गाइए,

वादा करती हूँ,अगली बार आप जब यहाँ आएँगे,

मुझे ऐसे ही स्वयंवर रचाते पाएँगे,

और तब तक आपके बचे-खुचे बाकी,बाल भी गिर जाएँगे.

Thursday, December 3, 2009

मेरी पहली हास्य भोजपुरी कविता:-आइए आप सब का मुलाकात कराते हैं, सुबह के भूले एक तिवारी जी से

अउर तिवारी कईसन हो,


बहुत दिनों के बाद मिले हो,

लागत हो दूबराय गये हो,

अब का करने को आए हो,

धरम-करम सब खाय गये हो,

अम्मा बाबू जब बीमार थे,

खबर नही तब लेने आए,

गुजर गये जब उ दूनो तब,

अब किसको का देने आए,


नेचर तनिको ना बदला है,

एकदम पहिले ज़ईसन हो,

अउर तिवारी कईसन हो,


बटवारे के टइम भगे थे,

सब कुछ बेच-बाच कर अपना,

सुंदर घर अच्छा परिवार,

टूटल तीउराइन क सपना,

बेटवा जब पलने में था,

तब आवारागर्दी सूझी,

कैसे पेट भरे बाबू जी,

तुमने नही ग़रीबी बुझी,


तब तो इतना अकड़ रहे थे,

अब काहे को अईसन हो,

अउर तिवारी कईसन हो,


दारू के चस्का में आकर,

सब रूपिया बिलवाय दिए,

देखत लागे भिखमंगा,

अब ई हालत पहुँचाय दिए,

तब तो तुम स्प्रिंग हुए थे,

काहे इतना सिकुर गये,

आज याद आइल परिवार,

एकदम से जब निपुर गये,


चेहरा इतना सुख गईल बा,

अस पियराइल बेसन हो,

अउर तिवारी कईसन हो,


चलअ ठीक बा आ गईलअ त,

वइसे भी घर तोहरे बा,

हाथ बटावा काम में घर के,

ई नाही की बईठ के खा,

अभी बहुत बा जिये के तोहे,

बढ़िया होई अगर जाग जा,

ई नाही की कुछ दिन रहके,

सुबह सबेरे उठअ भाग जा,


घर हो एक समर्पण स्थल,

घर ना कउनो टेशन हो,

अउर तिवारी कईसन हो,

Wednesday, November 25, 2009

इतना भी आसान नहीं

व्यस्तता के दौर से निकली सरल और सहज शब्दों में साकार, ग़ज़ल की कुछ लाइनें आप सब के नज़र करता हूँ..आशीर्वाद दीजिएगा.


सोच रहा था तुमसे मिलता,पर आना आसान नहीं,

फुरसत के कितने पल है,यह समझाना आसान नहीं,


हैरत में हूँ,मैं यह सुनकर,की मैं बदल गया हूँ अब,

मजबूरी में कदम बँधे है, कह पाना आसान नहीं,


बातें और बहाने ये सब औरों की आदत होगी,

सच्चाई से शब्द गुथे है, बतलाना आसान नहीं,


कितना भी समझा दूँ लेकिन झूठ तुम्हे सब लगता हैं,

सच की गाथा गाते हो, सच अपनाना आसान नहीं,


वैसे तो यह मन कहता है,दूरी बस एहसास है एक,

मगर ख्यालों की दुनिया में रह पाना आसान नहीं,


फिर भी नहीं समझना की मैं,भूल गया वो बीते पल,

यादों की उन महलों का भी, ढह जाना आसान नहीं,


ढूढ़ रहा हूँ कि कुछ टुकड़ा, वक्त कहीं से मिल जाए,

बँधन ही यह कुछ ऐसा है, बच पाना आसान नहीं,


चार पंक्ति का माफीनामा, ग़ज़ल बन गई है देखो,

तुम से इतनी दूरी भी तो सह पाना आसान नहीं.


Sunday, November 15, 2009

पप्पू जी का एक सवाल और पापा जी भी हैरान हो गये

कुछ दिनों की व्यस्तता के बाद आज थोड़े फुरसत के पल मिलें और बस फिर एक और कविता. आज एक नटखट बच्चे के शरारत भरे प्रसंग को हास्य कविता बना कर प्रस्तुत कर रहा हूँ...आशीर्वाद दीजिएगा!!!

पप्पू,पापा जी से बोला,
पापा एक सवाल बताओ,
इतना उपर उड़ जाता है,
कैसे गुब्बारा समझाओ.

पापा बोले ,बेटा पप्पू,
सही सवाल ढूढ़ कर लाओ,
ऐसे उल्टे प्रश्नों में तुम,
अपने को मत यूँ उलझाओ.

गुब्बारे में गैस भरी.है.,
सो वो उड़ता है,जाता ,
इतनी अकल नही है बुद्धू,
थोड़ा सा तो अकल लगाता.

एक मिनट फिर सोचा पप्पू,
फिर से अपना अकल लगाया,
पापा जी के पास में जाकर,
वहीं प्रश्न फिर से उलझाया.

बोला गैस में इतना दम है,
ऐसे गुब्बारे लहराते?,
वहीं गैस गर हम भी, पी लें,
तो क्या हम भी यूँ, उड़ जाते.

अगर असर सचमुच में है तो,
क्यों तुम ऐसे चिल्लाते हो,
गैस पेट में जब बनती है,
बोलो क्यों? ना उड़ जाते हो.

पापा बोले, ये पप्पू जी,
तुम हो हमसे बड़े महान,
जाओ जाकर सो जाओ अब,
कभी नही मैं दूँगा ज्ञान.


Thursday, November 5, 2009

क्यों, होता है ये सब

आप लोगो के प्यार और आशीर्वाद के वजह मैं खुद को रोक नही पाता बहुत व्यस्तता से घिरे होने के बावजूद भी आज यह मन नही माना और और बस कुछ लाइनें लेकर फिर से आ गया. परंतु अब शायद कुछ दिन बाद ही यहाँ आना संभव हो तो बस आप सभी से आग्रह है की ऐसे स्नेह बनाएँ रखे ...


इंसानों को इंसानों से इतनी भी मायूसी क्यों?

प्रेम मुफ़्त है इस दुनिया में,फिर भी ये कंजूसी क्यों?


क्यों बारिश की बूँद नदारद,

क्यों सूरज है आग भरा,

क्यों सावन है उलझा उलझा,

क्यों बसंत है डरा डरा,

क्यों खुश्बू की हवा से यारी,

धीमी पड़ती जाती है,

इंसानों की करतूतों से,

क्यों धरती शरमाती है,


शोर शराबा एक तरफ है, एक तरफ खामोशी क्यों?

प्रेम मुफ़्त है इस दुनिया में, फिर भी ये कंजूसी क्यों??


क्यों मंदिर मस्जिद होते हैं,

जाति-धर्म के झगड़े क्यों,

क्यों ज़मीन के लिए लड़ाई,

क्यों पिछड़े व अगड़े क्यों,

अपने दुख पर दुख होता है,

गैरों पर खुशहाली क्यों,

भौतिकता की बलि चढ़ गयी,

वृक्षों की हरियाली क्यों,


कब तक जागेंगे जग वाले, यारो ये बेहोशी क्यों??

प्रेम मुफ़्त है इस दुनिया में, फिर भी ये कंजूसी क्यों??


क्यों ईमान धरम है गायब,

बेईमानों के नाम हुए,

देखो पैसों की लालच में,

क्यों नेता बदनाम हुए,

रात भी सहमा सहमा रहता,

हर दिन होती एक सनसनी,

क्यों दहेज की माँग बढ़ी,

क्यों है बेटी बोझ बनी,


निर्धनता अभिशाप बन गयी, इसमें बेटी दोषी क्यों??

प्रेम मुफ़्त है इस दुनिया में, फिर भी ये कंजूसी क्यों??

Saturday, October 31, 2009

कभी नौबत नही आयी

गम यूँ मिला की वो,आँसुओं में डूब गया,
किसी मैखत में जाने की,कभी नौबत नही आयी.

अपनों ने ही सीखा दिए उसे,जमाने के उसूल,
गैरों को आज़माने की, कभी नौबत नही आयी.

कई सपने संवर कर टूट जाते, रात भर में अब,
सुबह के गुनगुनाने की, कभी नौबत नही आयी.

बाप बनकर जिसे सदा दी,जिंदगी के हर मोड़ पर,
उसे हक़ भी जताने की,कभी नौबत नही आयी.

जीवन पथ पर चलता रहा, कंधे पर बोझ लिए,
चहक कर मुस्कुराने की,कभी नौबत नही आयी.

घर की आँगन में ही दीवार, उठा लिए उसके अपने,
हसरते आशियाने की, कभी नौबत नही आयी.

बुढ़ापे में खुदा से जो मिला,यह तोहफा उसको,
जिसे जग से छुपाने की,कभी नौबत नही आयी.

पड़ोसी भी नुमाइस देखकर, हँस कर निकल जाते,
किसी से गम बताने की,कभी नौबत नही आयी.