Tuesday, December 11, 2012

दर्द ही जब दवा बन गई ---(विनोद कुमार पाण्डेय )

मित्रों,हास्य-व्यंग्य से थोडा हटकर एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ । अच्छा लगे तो  आशीर्वाद  दीजियेगा।|

दर्द ही जब दवा  बन गई 
मुस्कराहट अदा बन गई 

राह इतनी भी आसाँ न थी 
जिद मगर हौसला बन गई

सीख माँ ने  जो दी थी मुझे
उम्र भर की सदा बन गई 

संग दुआ जो पिता की रही 
बद्दुआ भी  दुआ बन गई 

पाप कहते थे जिसको  कभी 
छल-कपट  अब  कला बन गई  

झूठ वालों की इस भीड़ में 
बोलना  सच बला  बन गई  

चाँद से चाँदनी क्या मिली 
रात वो पूर्णिमा बन गई  

चूमना है गगन एक दिन 
ख्वाब अब प्रेरणा बन गई

25 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

वाह.... बहुत सुंदर गज़ल

kshama said...

Zid hamesha hausala banee rahe!

Sonia said...

Very nice Vinod San :)

Sonia said...

Very nice :)

दिगम्बर नासवा said...

विनोद जी ... बहुत ही लाजवाब हमेशा की तरह व्यंग का पुट लिए शेर ...

Harvinder Kaur said...

Amazing.. Hamesha ki tarah.. ek lajawab kavita..

पाप कहते थे जिसको कभी
छल-कपट अब कला बन गई

झूठ वालों की इस भीड़ में
बोलना सच बला बन गई

WAH WAH....

Harvinder Kaur said...

Amazing....

पाप कहते थे जिसको कभी
छल-कपट अब कला बन गई

झूठ वालों की इस भीड़ में
बोलना सच बला बन गई

WAH WAH KYA BAAT HAI..BAHUT KHOOOB...

ZEAL said...

बहुत सुन्दर ग़ज़ल --अंतिम लाइन में -- "प्रेरणा अब ख्वाब बन गयी" कर दीजिये !

हिंदी चिट्ठा संकलक said...

सादर निमंत्रण,
अपना बेहतरीन ब्लॉग हिंदी चिट्ठा संकलक में शामिल करें

उपासना सियाग said...

बहुत बढ़िया ...

Rohitas ghorela said...

चाँद से चाँदनी क्या मिली
रात वो पूर्णिमा बन गई .
वाह भाई साहब वाह ..कमाल कर दिया आपने ... मैंने "नई-पुरानी हलचल" पर भी इस पोस्ट के लिए टिप्पणी की है।

मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है बेतुकी खुशियाँ

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 13 -12 -2012 को यहाँ भी है

....
अंकों की माया .....बहुतों को भाया ... वाह रे कंप्यूटर ... आज की हलचल में ---- संगीता स्वरूप

. .

Pankaj Kumar Sah said...


बहुत सुंदर बिल्कुल दिल को छूने वाली ...बधाई .आप भी पधारो
http://pankajkrsah.blogspot.com
स्वागत है

Virendra Kumar Sharma said...


झूठ वालों की इस भीड़ में
बोलना सच बला बन गई

तेरा मुस्कुराना कज़ा ( बन )गई .

छोटी बहर की बड़ी गज़ल .

Virendra Kumar Sharma said...


झूठ वालों की इस भीड़ में
बोलना सच बला बन गई

तेरा मुस्कुराना कज़ा ( बन )गई .

छोटी बहर की बड़ी गज़ल .

Aditya Tikku said...

utam-***

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...


संग दुआ जो पिता की रही
बद्दुआ भी दुआ बन गई

भावपूर्ण शब्द ! लाजवाब शे'र !

पाप कहते थे जिसको कभी
छल-कपट अब कला बन गई

सही बात कहने का सही सलीका …
क्या बात है !

चाँद से चाँदनी क्या मिली
रात वो पूर्णिमा बन गई

बड़ा प्यारा शे'र है भाई !
सहज और सरल भाव !


विनोद कुमार पांडेय जी
आपकी पिछली कुछ पोस्ट्स आज पढ़ीं… तरही वाली ग़ज़ल भी , हास्य रचना भी
…सारी रचनाओं के लिए बधाई और मंगलकामनाएं !
…आपकी लेखनी से श्रेष्ठ सुंदर सार्थक रचनाओं का सृजन होता रहे …

शुभकामनाओं सहित…

हिंदी चिट्ठा संकलक said...

सादर आमंत्रण,
आपका ब्लॉग 'हिंदी चिट्ठा संकलक' पर नहीं है,
कृपया इसे शामिल कीजिए - http://goo.gl/7mRhq

Suman said...

पाप कहते थे जिसको कभी
छल-कपट अब कला बन गई
sahi kha hai ...sundar rachna
bahut bahut aabhar

vandana said...

राह इतनी भी आसाँ न थी
जिद मगर हौसला बन गई

बहुत सुन्दर ग़ज़ल

मनोज कुमार said...

चाँद से चाँदनी क्या मिली
रात वो पूर्णिमा बन गई
काफ़ी पोजिटिव थिन्किन्ग के साथ लिखी गई ग़ज़ल!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

वाह!

Mamta Bajpai said...

bahut sundar

विनोद कुमार पांडेय said...

एक अलग अनुभूति का एहसास कराती हुई एक सुन्दर रचना, सुन्दर छन्दमुक्त रचना जिसे बार बार पढ़ने का मन होता है। धन्यवाद संगीता जी|

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर ग़ज़ल