ब्लॉगर्स सम्मेलन और परिकल्पना उत्सव की सफलता के लिए सभी ब्लॉगर्स मित्रों को फिर से हार्दिक बधाई देना चाहता हूँ|हिन्दी साहित्य निकेतन और परिकल्पना उत्सव के समारोह के दौरान कई नये-पुराने मित्र मिलें जिनसे मिलकर बहुत खुशी हुई|साथ ही साथ ये भी पता चला की कुछ लोग हमसे नाराज़ बैठे है कि आजकल ब्लॉग लेखन में मेरी सक्रियता कुछ कम हो गई है|मित्रों,इस बात के लिए माफी चाहता हूँ,दरअसल आजकल व्यस्तता कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई है|उम्मीद है आप लोग मुझे माफ़ करेंगे और इस वादे के साथ की अब आगे ऐसा नही होगा एक छोटी बहर की ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ|धन्यवाद|
दिल की बात बताती आँखें
आँखों को समझाती आँखें
नफ़रत,प्रीत व दर्द खुशी सब
बिन बोले कह जाती आँखें
अंधेरो से घिरे भवन में
जैसे दीया-बाती आँखें
छोटी जलपरियों के जैसे
इधर उधर मंडराती आँखें
है नन्ही सी लेकिन सारे
जग की सैर कराती आँखें
प्यार लुटाती है अपनों पर
बदले आँसू पाती आँखें
ऐसा दौर चला है जिसमें
पल-पल धोखा खाती आँखें
बूढ़े बाबा हँस कर बोले,
शाम ढली,ढल जाती आँखें
चंद लम्हें थे मिले,भींगी सुनहरी धूप में, हमने सोचा हँस के जी लें,जिन्दगानी फिर कहाँ
Saturday, April 30, 2011
Saturday, April 2, 2011
जीत लिए हम विश्वकप--(विनोद कुमार पांडेय)
आप सभी को विश्वकप जीतने की बहुत बहुत बधाई..भारत की जीत के जश्न में मैनें भी कुछ शब्द जोड़ें है..कुण्डलिनी छ्न्द में मेरा पहला प्रयोग है..आपसे हौसला आफजाई की उम्मीद है..धन्यवाद
धोनी व गंभीर ने ऐसा किया कमाल,
मुरली की सब तान गई,हुए मलिंगा लाल,
हुए मलिंगा लाल, लगाया जब धोनी ने चौका,
जीत नही पाई श्रीलंका,गया हाथ से मौका,
श्रीलंकाई टीम की सूरत हो गई रोनी,
बड़े जोश से आगे बढ़ जब,छक्का मारे धोनी.
लाएँ हम फिर विश्वकप,स्वप्न हुए साकार,
जीते हम एक शान से, गई श्रीलंका हार,
गई श्रीलंका हार हुए संगकारा बहुत उदास
धोनी व गंभीर की नें रच डाली इतिहास
मुरली,महेला और मलिंगा भी ना कुछ कर पाएँ
और सचिन के लिए विश्व कप हम भारत में लाएँ..
Monday, March 28, 2011
कुछ मुक्तक २----(विनोद कुमार पांडेय)
मित्रों,एक लंबे अंतराल के बाद फिर से आया हूँ|अलग-अलग रंग के चार मुक्तक प्रस्तुत कर रहा हूँ|कुछ ठीक-ठाक बन पड़ा हो तो आशीर्वाद दीजिएगा|धन्यवाद
काँटों पे हमें चलने की,आदत सी हो गई
अब आग में भी जलने की,आदत सी हो गई
उँचाइयों से डर मुझे, बिल्कुल नही लगता
गिर कर के संभलने की,तो आदत सी हो गई
कैसी विडंबना है,गाँधी के देश में
डाकू टहल रहें हैं,साधु के वेश में
जनता के सच्चे सेवक,जनता को लूटकर
रखते है माल अपना,जाकर विदेश में
घोटाले,बेईमानी,भ्रष्टाचार देखिए
सिद्वांतवादिता यहाँ बीमार देखिए
चोरों की ठाठ-बाट है,मँहगाई ज़ोर पर
लाचार,मौन देश की सरकार देखिए
बाँटोगे अगर प्यार, तो फिर प्यार मिलेगा
व्यवहार के अनुसार ही, व्यवहार मिलेगा
हँस कर मिलोगे तुम तो,हँस कर मिलेंगें सब
बाजार बनोगे तो बाजार मिलेगा
Monday, March 7, 2011
कुछ मुक्तक १---(विनोद कुमार पांडेय)
काफ़ी दिनों के बाद इस बार एक नये प्रयोग के साथ आया हूँ|आप सबको मेरे गीत और ग़ज़ल पसंद आते रहे उसके लिए तहे दिल से धन्यवाद|आज पहली बार कुछ मुक्तक प्रस्तुत कर रहा हूँ,पसंद आए तो आशीर्वाद दीजिएगा|मुक्तक का विषय हमेशा की तरह मेरा पसंदीदा हास्य-व्यंग है|
1) बनते थे मेरे यार, आते नही नज़र
भूले सभी करार,आते नही नज़र
पहले तो रोज मिलते थे,होती थी हाल-चाल
जब से लिए उधार, आते नही नज़र
2) नफ़रत पनप रही है, अपनों की आड़ में
दुनिया लगी पड़ी है,अपने जुगाड़ में
कुछ ने बना लिया है,अब मूल-मंत्र ये
अपनी कटे मज़े में,सब जाएँ भाड़ में
3) गायब थे जो कल तक, वहीं मशहूर हो गये
धोखे-फरेब अब नये,दस्तूर हो गये
फैशन का भूत सबके, सर पर सवार है
बच्चें भी खिलौनों से बहुत दूर हो गये
Saturday, February 19, 2011
फिर आया बसंत का मौसम-----(विनोद कुमार पांडेय)
मित्रों, फ़रवरी का पूरा महीना बहुत व्यस्तता के दौर से गुज़रा|इसी वजह से फ़रवरी माह का पहला पोस्ट आज प्रस्तुत कर रहा हूँ|आज प्रस्तुत है बसंत के स्वागत में एक गीत जिसे कवि-सम्मेलनों और गोष्ठियों में काफ़ी पसंद किया गया पर आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत करने का मौका आज मिल पाया है|उम्मीद करता हूँ,लंबी अंतराल की अनुपस्थिति के लिए क्षमा करेंगें और गीत का आनंद लेंगे...एक बार फिर से आप सब के आशीर्वाद का आपेक्षी हूँ|धन्यवाद
फिर आया बसंत का मौसम, फिर छाया बसंत का मौसम
पतझड़ में नगमें बहार के, फिर गाया बसंत का मौसम
चला बाँटने प्यार की खुश्बू अपने साथ बहार लिए
पुरवा हवा के मंद गति में, मृदुल कोई झनकार लिए
फूलों से,कलियों से यारी,काँटों को भी स्नेह दिया
तन में, मन में और ह्रदय में प्यार भरा उपहार लिए
जीवन प्रीत बिना सूनी है,समझाया बसंत का मौसम
पतझड़ में नगमें बहार के, फिर गाया बसंत का मौसम
पेड़ों से विछोह पत्तों का,नये कोपलों को फिर लाना
मिलन और बिरहा की बातें,बातों-बातों में बतलाना
जवाँ उम्र पर जादू करना इस मौसम की चाल पुरानी
कलियों को इठलाने का गुर,भौरों को अंदाज सीखाना
पहले जैसी कोई कहानी फिर लाया बसंत का मौसम
पतझड़ में नगमें बहार के फिर गाया बसंत का मौसम
इस बसंत में यहीं दुआ है लोग सभी खुशहाल मिलें,
कोई नही भूखा सोये, कम से कम रोटी दाल मिलें
हरियाली चहूँ ओर मिलें, हर प्राणी प्रगतिशील रहे
अमन-चैन जग में फैले,सब अपराधी बेहाल मिलें
गीतों की महफ़िल देखी तो मुस्काया बसंत का मौसम
पतझड़ में नगमें बहार के, फिर गाया बसंत का मौसम
फिर आया बसंत का मौसम, फिर छाया बसंत का मौसम
पतझड़ में नगमें बहार के, फिर गाया बसंत का मौसम
चला बाँटने प्यार की खुश्बू अपने साथ बहार लिए
पुरवा हवा के मंद गति में, मृदुल कोई झनकार लिए
फूलों से,कलियों से यारी,काँटों को भी स्नेह दिया
तन में, मन में और ह्रदय में प्यार भरा उपहार लिए
जीवन प्रीत बिना सूनी है,समझाया बसंत का मौसम
पतझड़ में नगमें बहार के, फिर गाया बसंत का मौसम
पेड़ों से विछोह पत्तों का,नये कोपलों को फिर लाना
मिलन और बिरहा की बातें,बातों-बातों में बतलाना
जवाँ उम्र पर जादू करना इस मौसम की चाल पुरानी
कलियों को इठलाने का गुर,भौरों को अंदाज सीखाना
पहले जैसी कोई कहानी फिर लाया बसंत का मौसम
पतझड़ में नगमें बहार के फिर गाया बसंत का मौसम
इस बसंत में यहीं दुआ है लोग सभी खुशहाल मिलें,
कोई नही भूखा सोये, कम से कम रोटी दाल मिलें
हरियाली चहूँ ओर मिलें, हर प्राणी प्रगतिशील रहे
अमन-चैन जग में फैले,सब अपराधी बेहाल मिलें
गीतों की महफ़िल देखी तो मुस्काया बसंत का मौसम
पतझड़ में नगमें बहार के, फिर गाया बसंत का मौसम
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