आज प्रस्तुत है एक पुरानी ग़ज़ल जो गर्मी के तरही मुशायरे के लिए लिखी थी
आ गई है ग्रीष्म ऋतु तपने लगी फिर से है धरती
और सन्नाटें में डूबी, गर्मियों की ये दुपहरी
आग धरती पर उबलने,को हुआ तैयार सूरज
गर्म मौसम ने सुनाई, जिंदगी की जब कहानी
चाँद भी छिपने लगा है,देर तक आकाश में
रात की छोटी उमर से, है उदासी रातरानी
नहर-नदियों ने बुझाई प्यास खुद के नीर से जब
नभचरों के नैन में दिखने लगी है बेबसी सी
तन पसीने से लबालब,हैं मगर मजबूर सारे,
पेट की है बात साहिब कर रहे जो नौकरी जी
देश की हालत सुधर पाएगी कैसे सोचते हैं.
ये भी है तरकीब अच्छी, गर्मियों को झेलने की
चंद लम्हें थे मिले,भींगी सुनहरी धूप में, हमने सोचा हँस के जी लें,जिन्दगानी फिर कहाँ
Wednesday, June 22, 2011
Sunday, May 15, 2011
गीत लिखना छोड़ दूँ---विनोद कुमार पांडेय
मित्रों,जीवन में कुछ ऐसी बातें भी हो जाती है जो मन को अच्छी नही लगतीकुछ दिन पहले मेरे साथ भी ऐसी ही एक घटना घटी और प्रतिक्रिया स्वरूप एक नई ग़ज़ल बन गई..ज़्यादा नही कहूँगा आप लोग खुद समझ जाएँगे..भाव अच्छे लगे तो आशीर्वाद दीजिएगा
गीत गाना छोड़ दूँ, ग़म को भुलाना छोड़ दूँ
मुस्कुराना छोड़ दूँ, हँसना-हँसाना छोड़ दूँ
हादसों के ख़ौफ़ से कुछ लोग घबराने लगे
क्या इसी डर से क़दम आगे बढ़ाना छोड़ दूँ
भीड़ आँखें मूँद भागी जा रही, तो साथियो
मैं किसी की राह में पलकें बिछाना छोड़ दूँ
रेत है चारों तरफ़, सूखे कुँए तालाब, तो
क्या इसी डर से नई फ़सलें उगाना छोड़ दूँ
एक भी आँसू तुम्हारी आँख में है जब तलक
क्यों तुम्हारे दर्द को अपना बनाना छोड़ दूँ
सोचता है जो अकेला रह गया, मैं क्या करूँ
मैं उसे तनहा समझ अपना बनाना छोड़ दूँ
Sunday, May 8, 2011
आँचल की छाया----(विनोद कुमार पांडेय)
आज बस एक गीत देना चाहता हूँ|माँ को प्रणाम है
तेरी आँचल की छाया में,मुझको तो संसार दिखे,
याद नही पर सब कहते हैं,
जब घुटनों पर चलता था,
पथरीले आँगन में अक्सर,
गिरता और संभलता था,
चोट मुझे जब-जब लगती थी,
दर्द तुम्हे भी होती थी,
हर एक ठोकर पर मेरे,
तुम भी तो साथ में रोती थी,
सोच रहा हूँ आज बैठ कर अब तक कितनी दूर चला,
मेरे हर एक पग पे मैया, तेरा ही उपकार दिखे,
मैने बस महसूस किया,
तुम हर वो बातें जान गई,
मेरे अंदर छिपी भावना को,
झटपट पहचान गई,
कष्ट न जानें कितने झेलें,
मगर हमें इंसान बनाया,
खुद भूखे-प्यासे रह कर के,
हमको अमृत कलश पिलाया,
पहली कौर खिलायी तूने भले नही हो याद मुझे,
पर उस पहली कौर के आगे,फीका हर आहार दिखे,
मेरे हर अपराध की माता,
सज़ा तुम्हे भी मिलती थी,
दुनिया की कड़वी बातें,
पग-पग पर तुमको खलती थी,
फिर भी तुमने हँसते-हँसते,
हमको इतना बड़ा किया,
ज़िम्मेदारी हमें सीखा कर,
के पैरों पर खड़ा किया,
रक्षंबंधन,ईद,दशहरा,होली और दीवाली सब है,
आशीर्वाद नही जब तेरा,सुना हर त्योहार दिखे,
सारे रिश्ते-नाते देखे,
तुझ जैसी ना कहीं दिखे,
तेरी ममता सब पर भारी,
जिधर देखता वहीं दिखे,
अब तक जो कुछ,भी पाया हूँ,
सब कुछ आशीर्वाद तुम्हारे,
याद मुझे हैं तेरी वाणी,
सद्दविचार संवाद तुम्हारे,
जितना भी अब तक पाया हूँ,तुच्छ है सब कुछ माँ के आगे,
चुटकी जैसा यह भौतिक सुख, भारी माँ का प्यार दिखे.
तेरी आँचल की छाया में,मुझको तो संसार दिखे,
याद नही पर सब कहते हैं,
जब घुटनों पर चलता था,
पथरीले आँगन में अक्सर,
गिरता और संभलता था,
चोट मुझे जब-जब लगती थी,
दर्द तुम्हे भी होती थी,
हर एक ठोकर पर मेरे,
तुम भी तो साथ में रोती थी,
सोच रहा हूँ आज बैठ कर अब तक कितनी दूर चला,
मेरे हर एक पग पे मैया, तेरा ही उपकार दिखे,
मैने बस महसूस किया,
तुम हर वो बातें जान गई,
मेरे अंदर छिपी भावना को,
झटपट पहचान गई,
कष्ट न जानें कितने झेलें,
मगर हमें इंसान बनाया,
खुद भूखे-प्यासे रह कर के,
हमको अमृत कलश पिलाया,
पहली कौर खिलायी तूने भले नही हो याद मुझे,
पर उस पहली कौर के आगे,फीका हर आहार दिखे,
मेरे हर अपराध की माता,
सज़ा तुम्हे भी मिलती थी,
दुनिया की कड़वी बातें,
पग-पग पर तुमको खलती थी,
फिर भी तुमने हँसते-हँसते,
हमको इतना बड़ा किया,
ज़िम्मेदारी हमें सीखा कर,
के पैरों पर खड़ा किया,
रक्षंबंधन,ईद,दशहरा,होली और दीवाली सब है,
आशीर्वाद नही जब तेरा,सुना हर त्योहार दिखे,
सारे रिश्ते-नाते देखे,
तुझ जैसी ना कहीं दिखे,
तेरी ममता सब पर भारी,
जिधर देखता वहीं दिखे,
अब तक जो कुछ,भी पाया हूँ,
सब कुछ आशीर्वाद तुम्हारे,
याद मुझे हैं तेरी वाणी,
सद्दविचार संवाद तुम्हारे,
जितना भी अब तक पाया हूँ,तुच्छ है सब कुछ माँ के आगे,
चुटकी जैसा यह भौतिक सुख, भारी माँ का प्यार दिखे.
तेरी आँचल की छाया में,मुझको तो संसार दिखे,
Saturday, April 30, 2011
दिल की बात बताती आँखे---विनोद कुमार पांडेय
ब्लॉगर्स सम्मेलन और परिकल्पना उत्सव की सफलता के लिए सभी ब्लॉगर्स मित्रों को फिर से हार्दिक बधाई देना चाहता हूँ|हिन्दी साहित्य निकेतन और परिकल्पना उत्सव के समारोह के दौरान कई नये-पुराने मित्र मिलें जिनसे मिलकर बहुत खुशी हुई|साथ ही साथ ये भी पता चला की कुछ लोग हमसे नाराज़ बैठे है कि आजकल ब्लॉग लेखन में मेरी सक्रियता कुछ कम हो गई है|मित्रों,इस बात के लिए माफी चाहता हूँ,दरअसल आजकल व्यस्तता कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई है|उम्मीद है आप लोग मुझे माफ़ करेंगे और इस वादे के साथ की अब आगे ऐसा नही होगा एक छोटी बहर की ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ|धन्यवाद|
दिल की बात बताती आँखें
आँखों को समझाती आँखें
नफ़रत,प्रीत व दर्द खुशी सब
बिन बोले कह जाती आँखें
अंधेरो से घिरे भवन में
जैसे दीया-बाती आँखें
छोटी जलपरियों के जैसे
इधर उधर मंडराती आँखें
है नन्ही सी लेकिन सारे
जग की सैर कराती आँखें
प्यार लुटाती है अपनों पर
बदले आँसू पाती आँखें
ऐसा दौर चला है जिसमें
पल-पल धोखा खाती आँखें
बूढ़े बाबा हँस कर बोले,
शाम ढली,ढल जाती आँखें
दिल की बात बताती आँखें
आँखों को समझाती आँखें
नफ़रत,प्रीत व दर्द खुशी सब
बिन बोले कह जाती आँखें
अंधेरो से घिरे भवन में
जैसे दीया-बाती आँखें
छोटी जलपरियों के जैसे
इधर उधर मंडराती आँखें
है नन्ही सी लेकिन सारे
जग की सैर कराती आँखें
प्यार लुटाती है अपनों पर
बदले आँसू पाती आँखें
ऐसा दौर चला है जिसमें
पल-पल धोखा खाती आँखें
बूढ़े बाबा हँस कर बोले,
शाम ढली,ढल जाती आँखें
Saturday, April 2, 2011
जीत लिए हम विश्वकप--(विनोद कुमार पांडेय)
आप सभी को विश्वकप जीतने की बहुत बहुत बधाई..भारत की जीत के जश्न में मैनें भी कुछ शब्द जोड़ें है..कुण्डलिनी छ्न्द में मेरा पहला प्रयोग है..आपसे हौसला आफजाई की उम्मीद है..धन्यवाद
धोनी व गंभीर ने ऐसा किया कमाल,
मुरली की सब तान गई,हुए मलिंगा लाल,
हुए मलिंगा लाल, लगाया जब धोनी ने चौका,
जीत नही पाई श्रीलंका,गया हाथ से मौका,
श्रीलंकाई टीम की सूरत हो गई रोनी,
बड़े जोश से आगे बढ़ जब,छक्का मारे धोनी.
लाएँ हम फिर विश्वकप,स्वप्न हुए साकार,
जीते हम एक शान से, गई श्रीलंका हार,
गई श्रीलंका हार हुए संगकारा बहुत उदास
धोनी व गंभीर की नें रच डाली इतिहास
मुरली,महेला और मलिंगा भी ना कुछ कर पाएँ
और सचिन के लिए विश्व कप हम भारत में लाएँ..
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