Friday, September 10, 2021

(बालगीत)


मम्मी वो जूता दिलवा दो

जो चूँ चूँ चूँ चूँ करता है
पापा से कह कर मँगवा दो
जो चूँ चूँ चूँ चूँ करता है


जाड़े में जो दिलवाया था
वो जूता अब टूट रहा है
पैरों में हरदम रहता था
जाने क्यों अब रूठ रहा है
मुश्किल है अब इसे पहनना
अब तो जूता नया चाहिए
इसके साथ-साथ ही सुन लो
मोज़ा भी अब नया चाहिए


चाचा जी बाज़ार जा रहें हैं
तो वो ही ले आएँगे ।
उनको ही यह सब समझा दो
जो चूँ चूँ चूँ चूँ करता है l


मेरा जूता चुप रहता है
टिंकु का चूँ चूँ करता है
सब उसको देखते ध्यान से
मेरा दिल धूँ धूँ करता है
मेरी भी अब यहीं चाह है
मेरा जूता चूँ चूँ बोले
उछलूँ-कूदूँ उसे देखकर
सबका ध्यान मुझी पर डोले


लाइट भी हो जो जलती हो
जब मैं कदम बढ़ाऊँ तो
मामा से भी यह बतला दो
जो चूँ चूँ चूँ चूँ करता है


नहीं चाहिए कपड़ा मुझको
नहीं चाहिए कोई खिलौना
जूता नहीं दिलाया तो फिर
ख़ूब करूँगा रोना-धोना
उसे पहनकर नानी के घर
छुट्टी में जब जाऊँगा
ज़ोर ज़ोर से कूद कूद कर
सबका मन बहलाऊँगा


इंतज़ार है उस जूते का
जो सबके मन भाएगा
मम्मी इसी महीने ही ला दो
जो चूँ चूँ चूँ चूँ करता है l

--विनोद पाण्डेय


Tuesday, July 16, 2019

आ गया सावन - विनोद पांडेय

आ गया सावन सजन कब आओगे | 
रो रहा है मन सजन कब आओगे || 


छेड़ती मुझको हवाएं आजकल, 
हो रहा है दिल तुम्हारे बिन विकल |  
मंद है धड़कन सजन कब आओगे || 

नींद आती है नही अक्सर मुझे,
काटने को दौड़ता है घर मुझे | 
बढ़ गयी उलझन सजन कब आओगे || 

चेष्टाएँ लग रही है पाप सी ,
भावनाएं लग रही है सांप सी | 
देह चन्दन वन सजन कब आओगे ||

बादलों के सामने कमजोर हूँ ,
मौन से दबता मचलता शोर हूँ | 
कब तलक बंधन सजन कब आओगे || 

हार कर चुप हो गयी है रात यह  ,
कह दिया मैंने घनों से बात यह | 
प्रीति है पावन, सजन कब आओगे || 
आ गया सावन सजन कब आओगे || 

(गीत संग्रह एक शीशी गुलाब जल से )
चित्र :- आभार गूगल








Monday, July 15, 2019

तुम तरसा कर चले गए - विनोद पांडेय

तुम तरसा कर चले गए 


ओ बादल,क्या आना तेरा, झलक दिखा कर चले गए | 
 हम बैठे थे आस लगाए , तुम तरसा कर चले गए || 

तुमको देखा मन हरषाया ,
प्यास दबी थी उसे जगाया | 
सूखे सावन में तड़पा था ,
जो दिल उसने शोर मचाया |
लेकिन तुम कुछ समझ न पाए, आग लगा कर चले गए ||  हम बैठे थे ..... 


क्या है प्रेम समझ पाते तुम ,
थोड़ी देर ठहर जाते तुम |
धरती भी हँस लेती थोड़ी ,
काश जरा सा मुस्काते तुम | 
पहले से उदास बैठी थी, उसे रुला कर चले गए || हम बैठे थे .....  


बहुत खुश हुए थे, किसान भी ,
झुके हुए तन गए धान भी |
तुम्हें देखकर लगे झूमने ,
बूढ़े ,बच्चें और जवान भी | 
लगता था बरसोगे लेकिन , बस भरमा कर चले गए || हम बैठे थे ..... 


कलियों ने खुशबू बिखरायी ,
तुमको खुशबू रास न आयी |
बिजली रानी तड़प-तड़प के,
अपने दिल की व्यथा सुनायी  |

शायद सब के सब प्यासे थे, तुम तड़पा के चले गये || हम बैठे थे ..... 


नदियाँ खाली पड़ी हुई थी ,
आँखें तुम पर गड़ी हुई थी |  
हाथ उठा कर तुमको पाने ,
सारी बस्ती खड़ी हुई थी || 

तुमने फिर निराश कर डाला, ख्वाब दिखा कर चले गए ||  हम बैठे थे ..... 

आ जाओ फिर इंतजार है ,
तुमसे ही जग में बहार है | 
अबकी थोड़ी देर ठहरना ,
प्यासी धरती बेकरार है | 

नदी,फूल,हम सब प्यासे हैं , तुम इठला कर चले गए ||  हम बैठे थे ..... 

(विनोद पांडेय )

(गीत संग्रह "एक शीशी गुलाब जल" से )