Wednesday, November 25, 2009

इतना भी आसान नहीं

व्यस्तता के दौर से निकली सरल और सहज शब्दों में साकार, ग़ज़ल की कुछ लाइनें आप सब के नज़र करता हूँ..आशीर्वाद दीजिएगा.


सोच रहा था तुमसे मिलता,पर आना आसान नहीं,

फुरसत के कितने पल है,यह समझाना आसान नहीं,


हैरत में हूँ,मैं यह सुनकर,की मैं बदल गया हूँ अब,

मजबूरी में कदम बँधे है, कह पाना आसान नहीं,


बातें और बहाने ये सब औरों की आदत होगी,

सच्चाई से शब्द गुथे है, बतलाना आसान नहीं,


कितना भी समझा दूँ लेकिन झूठ तुम्हे सब लगता हैं,

सच की गाथा गाते हो, सच अपनाना आसान नहीं,


वैसे तो यह मन कहता है,दूरी बस एहसास है एक,

मगर ख्यालों की दुनिया में रह पाना आसान नहीं,


फिर भी नहीं समझना की मैं,भूल गया वो बीते पल,

यादों की उन महलों का भी, ढह जाना आसान नहीं,


ढूढ़ रहा हूँ कि कुछ टुकड़ा, वक्त कहीं से मिल जाए,

बँधन ही यह कुछ ऐसा है, बच पाना आसान नहीं,


चार पंक्ति का माफीनामा, ग़ज़ल बन गई है देखो,

तुम से इतनी दूरी भी तो सह पाना आसान नहीं.


21 comments:

महफूज़ अली said...

दूरी बस एहसास है एक, मगर ख्यालों की दुनिया में रह पाना आसान नहीं

sach kah rahen hain aap.... doori sirf ek ehsaas hi to hai.....

bahut hi achchi kavita...

ललित शर्मा said...

बहुत सुंदर चार लाईन का माफ़ीनामा एक गजल के रुप मे, बधाई

राज भाटिय़ा said...

फिर भी नहीं समझना की मैं,भूल गया वो बीते पल, यादों की उन महलों का भी, ढह जाना आसान नहीं,
वाह बहुत सुंदर जी. धन्यवाद

Apoorv said...

वैसे तो यह मन कहता है,दूरी बस एहसास है एक, मगर ख्यालों की दुनिया में रह पाना आसान नहीं,

hum to yahee kahenge bhai ki itanee acchee ghazal kahna bhi aasaan nahi hai..
behad meethi si ghazal!!

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लगा आप का यह बहाना या फ़िर माफ़ी नामा.
धन्यवाद

Udan Tashtari said...

हैरत में हूँ,मैं यह सुनकर,की मैं बदल गया हूँ अब,

मजबूरी में कदम बँधे है, कह पाना आसान नहीं,

-बहुत उम्दा!! वाकई बता पाना आसान नहीं.

Udan Tashtari said...

चार पंक्ति का माफीनामा, ग़ज़ल बन गई है देखो,
तुम से इतनी दूरी भी तो सह पाना आसान नहीं.

-बहुत खूब!!

Rakesh said...

चार पंक्ति का माफीनामा, ग़ज़ल बन गई है देखो,

तुम से इतनी दूरी भी तो सह पाना आसान नहीं.
are wah

wah wah

पी.सी.गोदियाल said...

बाते और बहाने ये सब औरो की आदत होंगी
सच्चाई से सब्द गुथे है बतलाना आसान नहीं

बहुत खूब विनोद जी !

Aman said...

Sach bolna aasan hai...sach ko apnana aasan nahi...
Bahut khoob pandey sahib..lage raho!!!!

Pandit Kishore Ji said...

vakai itna bhi aasaan nahi

दिगम्बर नासवा said...

ढूढ़ रहा हूँ कि कुछ टुकड़ा, वक्त कहीं से मिल जाए, बँधन ही यह कुछ ऐसा है, बच पाना आसान नहीं,
चार पंक्ति का माफीनामा, ग़ज़ल बन गई है देखो, तुम से इतनी दूरी भी तो सह पाना आसान नहीं.

विनोद जी .... बहुत ही उम्दा लिखा है ..... आज के दौर की त्रासदी को ...... मन के बोझ को आम शब्दों में उतार दिया है आपने ..... और ये अंतिम शेर तो जान है पूरी ग़ज़ल का ..... लेखक होने का हक़ अदा किया है इस शेर में ..

kshama said...

'Sach' ko apnaa lena sach me aasaan nahee..!
Saral sadagee bahree rachna!

Nirmla Kapila said...

चार पंक्ति का माफीनामा, ग़ज़ल बन गई है देखो,
तुम से इतनी दूरी भी तो सह पाना आसान नहीं.

वैसे तो यह मन कहता है,दूरी बस एहसास है एक, मगर ख्यालों की दुनिया में रह पाना आसान नहीं,
विनोद जी लाजवाब गज़ल है एक एक शेर काबिले तारीफ है। बहुत दिन बाद तो इतनी खूबसूरत रचना की आशा की जा सकती है बहुत बहुत बधाई

Babli said...

बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! हर एक पंक्तियाँ लाजवाब है! इस उम्दा रचना के लिए बधाई!

sada said...

हैरत में हूँ,मैं यह सुनकर,की मैं बदल गया हूँ अब,
मजबूरी में कदम बँधे है, कह पाना आसान नहीं !

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना, लाजवाब अभिव्‍यक्ति ।

Devendra said...

मन से निकली सीधी-सच्ची बात

singhsdm said...

फिर भी नहीं समझना की मैं,भूल गया वो बीते पल, यादों की उन महलों का भी, ढह जाना आसान नहीं,
बिलकुल जावेद अख्तर वाली स्टाइल में.................
तुम्हे भी याद नहीं मैं भी भूल गया
वो लकितना हसीं था मगर फ़िज़ूल गया....!
बहुत अच्छे

हरकीरत ' हीर' said...

विनोद जी आने में देर हुई .....क्षमा प्रार्थी हूँ.....हर शे'र बढ़िया लगा किसकी तारीफ करूँ किसकी न करूँ .....

ढूढ़ रहा हूँ कि कुछ टुकड़ा, वक्त कहीं से मिल जाए,
बँधन ही यह कुछ ऐसा है, बच पाना आसान नहीं,

बहुत खूब....!!

बाते और बहाने ये सब औरो की आदत होंगी
सच्चाई से शब्द गुथे है बतलाना आसान नहीं

दिल से निकली बात......!!

चार पंक्ति का माफीनामा, ग़ज़ल बन गई है देखो,
तुम से इतनी दूरी भी तो सह पाना आसान नहीं.

वाह....वाह....वाह......!!!!!!

mark rai said...

अगर तूफ़ान में जिद है ... वह रुकेगा नही तो मुझे भी रोकने का नशा चढा है ।

शरद कोकास said...

भई आठ शेर का है यह माफीनामा ..चार पंक्ति का नहीं