Monday, January 17, 2011

वाह रे मौसम----(विनोद कुमार पांडेय)

मौसम भी बड़ा दिलचस्प चीज़ है|गर्मी,बरसात या जाड़ा कोई भी मौसम हो आते ही तुरंत चर्चा में आ जाता है| मौसम आज कल आम आदमी के पास बहस का दूसरा मशहूर टॉपिक भी है| पहले पोज़िशन पर राजनीति है|वैसे ये भी बात सही है कि आम आदमी ज़्यादा प्रभावित भी इन्हीं दोनों चीज़ों से है|अगर अंतर की बात करें तो दोनों में एक खास अंतर यह है कि मौसम को तो बदलते देखा गया है पर राजनीति सालों-साल से जस की तस है|

खैर हम मौसम की बात कर रहे थे तो असल बात यह है कि मौसम कुछ ग़लत नही कर रहा है बल्कि हम ही उसे समझ नही पा रहे हैं |अब ठंड के मौसम में ठंड नही पड़ेगा तो क्या लू चलेगा?और अगर गर्मी में ओले पड़ जाए तो वो भी किसी को हजम नही होगा और पूरे दिन गाते फिरेंगे कि कैसा युग आ गया है भगवान,गर्मी में भी ओले पड़ रहे है |

दरअसल आदमी का स्वभाव ही ऐसा हो गया है| संतृष्टि मिलती ही नही पब्लिक की गणित कुछ ऐसे चलती है कि अगर ये हो गया तो वो क्यों नही हुआ? और वो हो गया तो ये होना चाहिए था|अब ऐसे में मौसम क्या करे|

आप को किसी भी समय,कोई भी बीमारी हो जाए आदमी के मुँह से सबसे पहले यहीं निकलता है सब मौसम का असर है|गर्मी की रात में छक कर आइसक्रीम खाओ और अगर सुबह हल्की सर्दी भी हो गई तो बस मौसम बदल रहा है| भाई मौसम बेचारे को कहीं तो बक्श दीजिए| हर समय बस सारी ग़लती मौसम की ही है ये तो नाइंसाफी हुई ना फिर कभी कभी अगर वो भी मनमानी करता है तो इसमें हल्ला मचाने वाली कौन सी बात है|हम अपनी मनमानी कर सकते है तो उसे भी अपनी मनमानी करने का पूरा अधिकार है|

हमें बोलने की आदत है सो हम बोलते रहते है| बाकी हमें सब पता है कि जब भयंकर भ्रष्टाचार,तेज मँहगाई,भीषण चोरबाज़ारी,बड़े बड़े घोटाले हमारा कुछ नही बिगाड़ पाए तो ये चार दिन का मौसम हमारा क्या बिगाड़ लेगा|अब तो हम सबको सहन करने की और दूसरों को दोष देने की आदत सी हो गई है|इस बात के लिए हम राजनीति का सदैव ऋणी रहेंगे जिस वजह से आज हम इतने सहनशील और मजबूत इरादे वाले बन पाए|

वैसे भी मौसम की मार के बारे में शोर करने वाले लोगों को यह याद ही नही रहता कि आख़िर हम नें प्रकृति को क्या दिया|धूल,धुआँ,प्रदूषण,गंदगी,शोर इत्यादि जब हमारे पास यहीं बेहतरीन मैटेरियल बचे है प्रकृति को देने के लिए तो हम मौसम से क्या अच्छे की उम्मीद रखें| जैसे को तैसे वाली बात तो अब हर जगह है|

और यहीं राज भी है मौसम के बदलने का अभी तो स्थिति बहुत सही है पर अगर ऐसे ही सब कुछ चलता रहा तो फिर देखिएगा| मौसम का स्टाइल आने वाले समय में ठंडी,गर्मी,बरसात सब कहर ढाएँगेऔर हम ऐसे ही दोष देते रहेंगे कि मौसम ऐसा है, मौसम वैसा है क्योंकि इससे ज़्यादा तो कुछ हमारे हाथ में रहेगा नही| इसलिए अभी ही सुधर जाना ही बेहतर है ताकि भविष्य में मौसम और हम दोनों संतुलित रहें|

6 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

मौसम को ऐसा बनाने वाले भी कहीं ना कहीं इन्सान ही हैं..... प्रकृति का कहर तो बरपेगा ही..... बहुत अच्छी लगी आपकी पोस्ट .....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मौसम और यह कटाक्ष की वर्षा ..बढ़िया मेल है

डॉ. मनोज मिश्र said...

सुंदर पोस्ट.

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर बात कही जी धन्यवाद

दीप्ति शर्मा said...

vah re moosam
..
kya bat hai
...
mere blog par
"jharna"

दिगम्बर नासवा said...

इंसान को शुरू से आदत है अपना दोष दूसरों के सर मढने की .... फिर मौसम तो बेचारा कुछ बोल ही नहीं सकता ....