Wednesday, October 28, 2009

कुछ तो करो

भीड़ में क्यों तनहाँ हो तुम,
तनहाई के लिए कुछ करो,

हमसाया भी जान छुड़ाती,
परछाईं के लिए कुछ करो,

हे आलस के धारक मानव,
जमहाई के लिए कुछ करो,

क्या खोया क्या पाया छोड़ो,
भरपायी के लिए कुछ करो,

जग क्यों रुसवा है,इंसान से,
रुसवाई के लिए कुछ करो,

जनता के सुख चैन नदारद,
महंगाई के लिए कुछ करो,

कब तक सितम सहोगे यूँ,
हरज़ाई के लिए कुछ करो,

देर हो रही है, बाबू जी,
शहनाई के लिए कुछ करो,

19 comments:

mehek said...

जनता के सुख चैन नदारद,
महंगाई के लिए कुछ करो,

कब तक सितम सहोगे यूँ,
हरज़ाई के लिए कुछ करो,
waah bahut khub

महफूज़ अली said...

हे आलस के धारक मानव,
जमहाई के लिए कुछ करो,

yeh panktiyan bahut achchi lagin....

ek saarthak sandesh deti.... behtareen rachna....

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Bahut bahut dhanyawaad Vinod ji....

अजय कुमार झा said...

अमा एक प्रेम पत्र तो लिख ही डालो,
कम से कम , लुगाई के लिये कुछ करो॥

दो घूस, बख्शीश, या और कोई तरीका ढूंढो,
कब तक लोगे तारीख जल्द सुनवाई के लिये कुछ करो

बाह बाह बिनोद बाबू का ठेले हैं ..हम भी दो लाईन धकेले हैं....

राज भाटिय़ा said...

देर हो रही है, बाबू जी,
शहनाई के लिए कुछ करो,

बहुत खुब जी... हर आदमी परेंशा है
धन्यवाद

रश्मि प्रभा... said...

parchhayin ke liye kuch karo,shayad koi hakikat mil jaye.....bahut badhiyaa

दिगम्बर नासवा said...

जनता के सुख चैन नदारद,
महंगाई के लिए कुछ करो .......

BAHOOT HI LAJAWAAB VINOD JI .. HAASY KE SAATH VISHAY PAR BHI MAJBOOT PAKAD RAKHI HAI ... SAARTHAK RACHNA HAI ....

M VERMA said...

क्या खोया क्या पाया छोड़ो,
भरपायी के लिए कुछ करो,
सरल शब्दो के बाण सटीक है.
बहुत ही प्रभावी

ओम आर्य said...

बहुत ही खुबसूरत ख्याल से सज्जी है आपकी कुछ तो करो.......एक एक शेर काबिले तारिफ है .........जिसमे सन्देश भी है कुछ करने की ललक भी दिखई देती है ........एक छटपटाहट भी दिखती है कुछ कर गुजरने की एहसास भी है ..........सुन्दरता से से उकेरा है दिल के एहसासो को ........विनोद जी /बधाई!

kshama said...

Bahut khoob! Aalas jhatak, janta jage to sahee...insaan jaage to sahee...! Kitne achhe dhang se apnee baat rakhee hai aapne! Hearty Congrats!

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

जग क्यों रुसवा है,इंसान से,
रुसवाई के लिए कुछ करो,
mere lie ye taza soch thee
basdhai

Babli said...

बहुत ही सुंदर और बढ़िया संदेश देते हुए आपने बड़ा ही शानदार और भावपूर्ण रचना लिखा है! बहुत खूब!

Nirmla Kapila said...

जनता के सुख चैन नदारद,
महंगाई के लिए कुछ करो,

कब तक सितम सहोगे यूँ,
हरज़ाई के लिए कुछ करो,

देर हो रही है, बाबू जी,
शहनाई के लिए कुछ करो,
वाह विनोद जी बहुत सुन्दर रचना है ये तीनो शेर लाजवाब हैं बधाई

sada said...

देर हो रही है, बाबू जी,
शहनाई के लिए कुछ करो !

बहुत ही सुन्‍दर पंक्तियां ।

राजाभाई कौशिक said...

अच्छा लिखा है बधाई के लिये
ढेरों बधाई है लिखाई के लिये

Mishra Pankaj said...

सुन्दर कविता विनोद जी आपकीपोस्ट मुझे हर बार देरी से मिलती है

Devendra said...

क्या खोया क्या पाया छोड़ो
भरपाई के लिए कुछ करो

वाह!

Mrs. Asha Joglekar said...

सुंदर है आपकी कविताई
अब छपाई के लिये कुछ करो
य़ूंही लिख दिया पर गज़ल बहुत सुंदर है छोटे छोटे शेरों में बडी बडी समस्याओं की और ध्यान खींचती हुई ।

अर्शिया said...

ये लीजिए, आपकी शानदार गजल पढकर हमने आपके ब्लॉग पर कमेंट कर दिया। अब मत कहिएगा कि कुछ तो करो।
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स्त्री के चरित्र पर लांछन लगाती तकनीक
आइए आज आपको चार्वाक के बारे में बताएं

महेन्द्र मिश्र said...

bahut badhiya rachana . vinod ji badhai....