Friday, October 9, 2009

जीवन-सूत्र

रास्ता खुद से बनाना चाहिए,

लक्ष्य पर नज़रें जमाना चाहिए,

है सदा संघर्ष जीवन में मगर,

मुश्किलों में मुस्कुराना चाहिए,


सोच कर कदमें बढ़ाना चाहिए,

हौसला-ए-दम दिखाना चाहिए,

पर कभी जब आधियाँ कुछ तेज हो,

धैर्य रख कर बैठ जाना चाहिए,


मन में एक विश्वास लाना चाहिए,

जिंदगी हँस कर बिताना चाहिए,

चीर कर पर्वत भी आगे बढ़ चलो,

हसरतों को ना मिटाना चाहिए.


ख्वाब से मन को सजाना चाहिए,

ख्वाब को सच भी बनाना चाहिए,

क्या पता कब लॉटरी खुल जाए किस्मत की,

रोज किस्मत आजमाना चाहिए,


प्रेम का पौधा उगाना चाहिए,

दिल से नफ़रत को मिटाना चाहिए,

जीत लो दिल हर किसी को चार लफ़्ज़ों में,

लब पे मीठे बोल लाना चाहिए,

Tuesday, October 6, 2009

कुछ मचलती किंतु कमजोर तमन्नाएँ, उनकी जिन्हें ग़रीब कहते हैं

कुछ आधी अधूरी तमन्नाएँ जो एक पल में बनती है और एक पल में बिखर जाती है..

ऐ तमन्ना,

तू इतना,मचल क्यों रही है,

दिखावे की दुनिया में,

तू ढल क्यों रही है.


तू निरा अज्ञानी है,

या अबोध है,अथवा ये तेरी भूल है,

काँटे हैं तेरी राह में

फूल नही शूल है,

तुझे मचलना ही था,

जग के विचित्र चित्रों में ढलना ही था,

तो किसी धनवान के मन में उपजती,

वहाँ तू फूलती-फलती,

राजमहल के अद्भुत,

रंगिनियों में संवरती,

असहाय ग़रीब के,

मन के,

पगडंडीयों पर क्यों चल रही है||ऐ तमन्ना.....


तू देख तो सकती है?,

देखो,

महसूस करो,

रिश्तों के विभिन्न रूप,

किस तरह परिवर्तित हो रहे हैं,

किस तरह बेनाम,बदनाम लोग इस दुनिया मे,

चर्चित हो रहे हैं,

तुम्हारे हिस्से का वक्त भी,

किन्कर्तव्य विमूढ़ है,

तुम्हारा जन्मदायी भी आज मूढ़ है,

कोमल भावनाओं से वैर कर के,

गहन ज्वाला पर पैर धर के,

इस भाँति तू जल क्यों रही है||ऐ तमन्ना.....


तू ग़रीब के मन की,

बीज़ है,

तो क्या हुआ,

सोचो मत,

हँसी मुश्किल से आती है,

तो क्या हुआ,

वक्त प्रायः रूलाती है,

तो क्या हुआ,

इससे अधिक रोने को कुछ नही है,

पाना है तुझे अब,

खोने को कुछ नही है,

सारी शक्तियाँ झोंक दे,

राह के तूफान को तू रोक दे,

हिमालय सा बन,

बर्फ के टुकड़ों की भाँति गल क्यों रही है||


ऐ तमन्ना,

तू इतना,मचल क्यों रही है,

दिखावे की दुनिया में, तू ढल क्यों रही है||

Friday, October 2, 2009

सत्य अहिंसा को पूजूँ या पूजूँ ए.के. सैतालीस को

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी को सादर नमन करते हुए, प्रस्तुत करता हूँ आज के बदलते हालात पर चंद लाइनें

सत्य अहिंसा को पूजूँ या पूजूँ ए.के. सैतालीस
को,
झूठ खरीदे जाते अब तो,हिंसा की होती जय कारी,

स्वार्थ,मोह,माया से दबकर, मानव शब्द विलुप्त हुआ,
दया किसी कोने में दुबका, तोड़ रही दम क्षमा बेचारी,

कितने बदल चुके है लोग,नर ही नर का दुश्मन है,
दूभर हुआ साँस तक लेना,ऐसी मची है, मारामारी,

पता चला दो दिल रखते थे, वे भी अपने सीने में,
छोड़ गये हमको दलदल में,कल तक बनते थे, हितकारी,

बैठे सोच रहे हैं चाचा, बेटे की शादी करनी है,
लालच की लपेट तो देखो,बाप बन गया है व्यापारी,

कहाँ गयी वो अदब हया,जब तक नही कमाते थे,
पूत के तेवर ऐसे बदले,शब्द बन गये छुरी-कटारी,

सोच रहे थे,इस अगहन में, कन्यादान करूँ बिटिया का,
कैसे बच पाते बाबू जी,अस्पताल जो था सरकारी,

दारू पी कर मस्त हुए है, कल्लू राम समोसे वाले,
अपना पॉकेट हरा भरा हो,भाड़ मे जाए दुनियादारी.

Saturday, September 26, 2009

विनम्र निवेदन है भगवान राम जी से एक बार फिर पृथ्वी पर आने की कृपा करें.

विजय पर्व दशहरा की सभी को हार्दिक बधाई..आज इस विजय पर्व पर काव्य की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत है.

एक दशहरा और आ गया,सोच के मन में उठे विचार,
इतने रावण घूम रहें हैं, राम कहाँ गायब हैं, यार.

आतंको से आतंकित है,
बस्ती,कस्बा,गली,मोहल्ला,
चारो ओर मचा है देखो,
छीना,झपटी,हल्ला-गुल्ला,
झूठ की जय-जय कार हो रही,
सत्य सनातन आहत है,
पापी नाच रहें हैं,धुन पर,
पुण्य की रोज शहादत है,

सालों-साल बढ़ रहे रावण,जो कल सौ थे,हुए हज़ार
इतने रावण घूम रहें हैं, राम कहाँ गायब हैं, यार.

रावण के जड़ से विनाश का,
वो दिन प्रभु कब आएगा,
त्रेता युग की रामायण को,
कलयुग कब दोहराएगा,
जाति-पाँत,ईमान-धरम,
से कब पहरे हट जाएँगे,
शबरी का विश्वास जीतने ,
कब पुरुषोत्तम आएँगे,

जाति धर्म को पीछे कर के,जिसने अपनाया था प्यार,
इतने रावण घूम रहें हैं, राम कहाँ गायब हैं,यार


मानव को मानव से भय है,
भाई को भाई पर शंका,
शोर-शराबा,मारा काटी,
हुई अयोध्या भी अब लंका,
क्यों विभीषण रोज हैं,मरते,
सत्य का जो दामन पकड़े,
रोज हरण होता है सिय का,
क्यों हैं राम अबूझ पड़े,

बड़ी ज़रूरत आन पड़ी है, फिर से ले लो प्रभु अवतार ,
इतने रावण घूम रहें हैं, राम कहाँ गायब हैं, यार.

आज भी कुछ भूखे सोते हैं,
कहने को विकास है बस,
कुछ महलों में राज कर रहे,
कुछ झोपड़ियों में बेबस,
आँखों में बस एक आस है,
दुख के बादल कब जाएँगे,
कब आएँगे रामचंद्र जी,
रामराज्य को कब लाएँगे,

इसी दशहरे पर आ जाओ, साथ मनाते हैं त्योहार,
इतने रावण घूम रहें हैं, राम कहाँ गायब हैं,यार.

Wednesday, September 23, 2009

एहसास


नित पुष्प खिला कर,खुशियों के,
मन बगिया महकाया तुमने,
आँखों के आँसू लूट लिये,
हँसना सिखलाया तुमने,
सूना,वीरान,अधूरा था,
तुमसे मिलकर परिपूर्ण हुआ,
दिल के आँगन में तुम आई,
जीवन मेरा संपूर्ण हुआ,

किस मन से तुझको विदा करूँ,
तुम ही खुद मुझको बतलाओ,
मैं कैसे कह दूँ तुम जाओ.

मैं एक अकेला राही था,
संघर्ष निहित जीवन पथ पर,
तुम जब से हाथ बढ़ायी हो,
यह धरती भी लगती अम्बर,
व्याकुल नयनों की आस हो तुम,
मेरी पूजा तुम,विश्वास हो तुम,
हर सुबह तुम्ही से रौशन है,
हर एक पल की एहसास हो तुम,

एहसासों का मत दमन करो,
विश्वासों को मत दफ़नाओं,
मैं कैसे कह दूँ, तुम जाओ,

सब बंद घरों में क़ैद पड़े,
मैं किससे व्यथा सुनाऊँगा,
सुख में तो देखो भीड़ पड़ी,
दुख किससे कहने जाऊँगा,
बरसों तक साथ निभाया है,
अब ऐसे मुझको मत छोड़ो,
हम संग विदा लेंगे जग से,
अपने वादों को मत तोडो,

मत बूझो मेरे मन को यूँ,
मत ऐसे कह कर तड़पाओ,
मैं कैसे कह दूँ, तुम जाओ.