चंद लम्हें थे मिले,भींगी सुनहरी धूप में, हमने सोचा हँस के जी लें,जिन्दगानी फिर कहाँ
Saturday, March 20, 2010
रिश्ते भी चलचित्र बनें हैं दुनिया में--------(विनोद कुमार पांडेय)
Sunday, March 14, 2010
उतर गया था बुखार सारा,पड़े जो जूते तेरी गली में-------(विनोद कुमार पांडेय)
आदरणीय पंकज सुबीर जी द्वारा होली के तरही मुशायरे के लिए दिए गये मिसरे पर आधारित एक मजेदार रचना.
सुबह सवेरे जो घर से निकले, खुमारी होली थी सर पे छाई,
हज़ार रंगों से रंग चेहरा, तुम्हारे घर को कदम बढ़ाई,
यूँ झूमते हम निकल पड़े थे, इब्न-बतूता का गीत गाकर,
नज़र न आया वो गंदा नाला,जहाँ गिरे हम छटक के जाकर,
नशा वहीं पर हुआ था गायब, सुधर गये हम तेरी गली में,
उतर गया था बुखार सारा, पड़े जो जूते तेरी गली में,
वहाँ से जैसे बढ़े थे आगे, जो देखे हमको लगे खिझाने,
छटांक भर के वो सारे लड़के,लगे हमारी हँसी उड़ाने,
फटी बनियान, फटी थी टोपी,व चेहरा जैसे कोई निशाचर,
पड़ी जो भाभी मेरे सामने, मैं भागा सरपट नज़र झुकाकर,
लजाती नज़रें बता रहीं थी, मेरी कहानी तेरी गली में,
उतर गया था बुखार सारा, पड़े जो जूते तेरी गली में,
तुम्हारी अम्मा ने हमको देखा,लगी थी बाबू जी को बुलाने,
खड़ा है देखो भिखारी कोई, इसे दिला दो दो-चार दाने,
वो गुझिया-पापड़ दिया था तुमने,समझ के कोई भिखारी टोली,
तुम्हारे अब्बा के डर से हमने, तनिक न अपनी ज़ुबान खोली,
गली के कुत्ते भी मेरे पीछे,निकल लिए थे तेरी गली में,
उतर गया था बुखार सारा, पड़े जो जूते तेरी गली में.
रहेगी हमको ये याद होली,ज़रा सी ग़लती क्या गुल खिलाई,
कई बरस हमने खेली होली,न ऐसी नौबत कभी थी आई,
बना था ज़ीरो जो कल था हीरो,नशे ने सब कुछ बिगाड़ डाली,
की जैसे पहुँचा मैं अपने घर पर,मिली थी स्वागत में माँ की गाली,
न पूछो कैसे मनाया हमने, हमारी होली तेरी गली में,
उतर गया था बुखार सारा, पड़े जो जूते तेरी गली में.