धक्का-मुक्की,हल्ला-गुल्ला,लोग-लोग पर टूटे हैं||
महानगर की चकाचौंध को,देख पसीने छूटे हैं||
आसमान की नाक पकड़ती मंज़िल बड़ी-बड़ी देखी,
गीत सुनाती लिफ्ट भी देखी,सीढ़ी खड़ी-खड़ी देखी,
सिगरेटों के धुएँ उड़ाते पुरुषों की भी लड़ी देखी,
बीयर-बार में बालाओं को टल्ली हुई पड़ी देखी,
उनके माँ-बाबूजी से तो भाग्य-विधाता रूठे हैं||महा.
मस्त चमाचम सड़कें चमकें तनिक नही भी धूल दिखे,
पंचसितारा होटल जैसे बच्चों के स्कूल दिखे,
गंदे नाले ऐसे दिखते जैसे स्वीमिंग पूल दिखे,
लंबी-चौड़ी जाम दिखे पर बढ़िया ट्रैफिक रूल दिखे,
चौराहे पर हवलदार भी बढ़िया रुपया लूटे हैं||महा.
शॉपिंग-मॉल के अंदर झाँके देख नज़ारा खीस लगे,
४४ के हुए चचा पर देखो तो २४ लगे,
हरियाली की दशा देख कर मन में थोड़ा टीस लगे,
ग़लती से भी थूक दिए तो उसके भी कुछ फीस लगे
समतल राहों में भी देखा जगह-जगह पर खूटे हैं||महा.
कपड़े,खाने और खिलौनों से दुकान सब भरे मिले,
लड़के और लड़कियाँ दोनों वस्त्र मोह से परे मिले,
भूखे और ग़रीब शहर में सहमें एवं डरे मिले,
लोग सजे-सँवरे दिखते हैं बूढ़े भी छरहरे मिले,
चमकीलें कुर्तों के उपर रंग-बिरंगे बूटे हैं||महा.
दिन को साथ लपेटे घूमें ऐसी काली रात दिखी,
चालीस साल का दूल्हा लेकर स्पेशल बारात दिखी,
स्पेशल बाइक-कारें और स्पेशल औकात दिखी,
छोटी-छोटी बातों पर भी भारी जूता-लात दिखी,
नया दौर का नाटक देखा सोचा लगा अनूठे हैं||
महानगर की चकाचौंध को,देख पसीने छूटे हैं||