अभी सुबह ५ मिनट की बूंदा-बंदी के बाद शांत पड़े बादल जी के नाम एक पत्र है काव्य रस से ओत प्रोत शायद सभी को पसंद आए..
लो फिर टिपटिपा के चले गये|
खुशी हुई तुम आए थे,
थोड़ी देर ठहरते तो,
ऐसी भी क्या हुई बेरूख़ी,
थोड़ी देर बरसते तो,
मौसम खूब बनाए थे,पर बस भरमा के चले गये|
आँधी के झोंकों ने तेरे,
स्वागत में संगीत बजाई,
बिजली रानी तड़प-तड़प के,
अपने मन की व्यथा सुनाई,
सारी बातें अनदेखी कर,कान दबा के चले गये|
गर्मी के गर्म थपेड़ों से,
धरती भी हलकान पड़ी,
हाथ उठा कर तुमको पीने,
सारी दुनिया हुई खड़ी,
वो सब प्यासे आस लगाए,तुम तड़पा के चले गये|
चलो ठीक है अबकी जाओ,
पर जल्दी दोबारा आना,
दिन-दिन गर्मी बढ़ती जाती,
थोड़ी शीतलता पहुँचना,
मैं विनती करता हर बार,तुम बहका के चले गये|