मुक्तक -3
सूट-बूट हो भले विदेशी दिल देशी कहलायेगा
हिन्दुस्तानी कहीं रहे हिंदी को गले लगाएगा
भले झाड़ता हो कोई दिन-रात सिर्फ अंग्रेजी ही
बाथरूम के अंदर तो हिंदी गाना ही गायेगा l
~विनोद पाण्डेय
हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ
चंद लम्हें थे मिले,भींगी सुनहरी धूप में, हमने सोचा हँस के जी लें,जिन्दगानी फिर कहाँ
मुक्तक -2
भारी है बीमारी न कोई दिख रहा इलाज
संवेदनाएँ मर रहीं ग़ायब है शर्म-लाज
हम गिन रहे हैं सिर्फ़ सियासत में कमी पर
पूरे समाज का ही पतन हो रहा है आज
~ विनोद पाण्डेय
मम्मी वो जूता दिलवा दो