Friday, June 30, 2017

ओ बादल,क्या आना तेरा झलक दिखा कर चले गए --(विनोद कुमार पांडेय )

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

सालों गुजर गए एक वो समय हुआ करता था जब ब्लॉग से नजर नहीं हटती थी ,सुबह-शाम ब्लॉग लिखने और पढ़ने का जो भूत  सवार था वो फेसबुक के आने के बाद धीरे -धीरे कम होता गया,हमारे जैसे बहुत से लोग लिखते-पढ़ते रहे पर वो लय नहीं बन पायी |  परन्तु बेहद  खास बात रही कि ब्लॉग के दोस्त बिछुड़ने नहीं पाए और शायद इसी खास वजह से आज हम फिर संगठित होकर 

#हिन्दी  ब्लॉगिंग के लिए आगे आये हैं | सभी मित्रों का पुनः स्वागत है ,एक बार फिर से सब मिलकर साथ चले और हिन्दी ब्लॉगिंग को एक और नया मुकाम दें |  

आज इस नए कदम का स्वागत करते हुए ,एक कविता से ब्लॉगर्स डे को मानना चाहता हूँ ,बरसात हो रही है और नहीं भी हो रही है ,ऐसे मौसम में भाव उपजा है तो आप सभी के सम्मुख रह रहा हूँ | सभी ब्लॉगर्स मित्रों को अन्तर्राष्ट्रीय ब्लॉगर्स डे की बहुत बहुत बधाई  | 



ओ बादल,क्या आना तेरा झलक दिखा कर चले गए 
हम बैठे थे आस लगाए तुम तरसा कर चले गए 

तुमको देखा मन हरषाया 
प्यास दबी थी उसे जगाया 
सूखे सावन में तड़पा था 
जो दिल उसने शोर मचाया  
लेकिन तुम कुछ समझ न पाए आग लगा कर चले गए । हम बैठे थे ..... 

क्या है प्रेम समझ पाते तुम 
थोड़ी देर ठहर जाते तुम 
धरती भी हँस लेती थोड़ी 
काश जरा सा मुस्काते तुम 
पहले से उदास बैठी थी उसे रुला कर चले गए । हम बैठे थे .....  

बहुत खुश हुए थे किसान भी 
झुके हुए तन गए धान भी 
तुम्हें देखकर लगे झूमने 
बूढ़े ,बच्चें और जवान भी 
लगता था बरसोगे लेकिन बस भरमा कर चले गए । हम बैठे थे ..... 

कलियों ने खुशबू बिखरायी 
तुमको खुशबू रास न आयी 
बिजली रानी तड़प-तड़प के,
अपने दिल की व्यथा सुनाई,
शायद सब के सब प्यासे थे तुम तड़पा के चले गये । हम बैठे थे ..... 

नदियाँ खाली पड़ी हुई थी 
आँखे तुम्ही पर गड़ी हुई थी 
हाथ उठा कर तुमको पाने ,
सारी बस्ती खड़ी हुई थी 
तुमने फिर निराश कर डाला ख्वाब दिखा कर चले गए । हम बैठे थे ..... 

आ जाओ फिर इंतजार है 
तुमसे ही जग में बहार है 
अबकी थोड़ी देर ठहरना
प्यासी धरती बेकरार है 

नदी,फूल,हम सब प्यासे हैं तुम इठला कर चले गए । हम बैठे थे ..... 


--विनोद पांडेय 

Sunday, January 8, 2017

किसकी नैया पार लगेगी ,किसकी डूबेगी

नया साल वाकई बहुत धमाका लेकर आया । सभी राजनैतिक पार्टियों ने अपने-अपने औकात के हिसाब से नये साल का स्वागत किया । पर सबसे जोरदार स्वागत समाजवादियों ने किया । नए साल के स्वागत में समाजवादियों ने दंगल का प्रोग्राम रखा जिसमें बाप ,बेटे और चाचा को बारी-बारी से लड़वाया गया ।मुकाबला जम कर हुआ ,दाँव पर दाँव दिखे पर चित्त कोई नहीं हुआ । झाड़-पोछ कर उठ खड़े हो जा रहे हैं और विजेता कौन कहलाये ,यह निर्णय करना बड़ा मुश्किल हो रहा है । मामला तो इतना बढ़ गया कि दंगल को प्रायोजित करने वाले एक अंकल जी भागने के मूड में आ गए ।लेकिन उनका मूड बार-बार बदल जाता है क्योंकि उनकी मज़बूरी है कहीं न कहीं,कुछ न कुछ प्रायोजित करते रहना । इसलिए सबसे हिट प्रोग्राम में शामिल होने का फायदा वो छोड़ना नहीं चाहते हैं ।वैसे भी उनको एक बार खदेड़ा गया था मगर बड़े पहलवान जी का ह्रदय परिवर्तन हो गया तो इनको बुला लिए । आज बड़े पहलवान जी को ही चुनौती मिल रही है । देखिये आगे क्या होता है ,पर जो भी होगा मजेदार होगा । अब बहुजन की बात करें तो बहन जी के दबाव में बहुजन ज्यादा हो हल्ला नहीं कर पर रहें हैं । बहन जी भी चुपचाप हो कर अपना काम कर रही हैं । मन करता है तो कभी-कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर लेती हैं बाकि टाइम गंभीरता से चुनाव प्रचार में लगी हैं । सारे बड़े बहुजन गंभीर हैं ,हाथी जैसी गंभीरता चिह्नित हो रही है ,ये अलग बात है की पेट भारी है अतः उसको भरने के लिए कुछ न कुछ करना पड़ता है । उन्होंने भी किया तो बहुजन प्रिय लोगों ने खूब चंदा दिया जिस पर सीबीआई वाले भी गंभीर हो गए । अब ये सीबीआई वाले नहीं समझ पर रहे हैं कि हाथी के रखरखाव में पैसा तो लगता ही है । दूसरी बात बहन जी ने जीवन भर सिर्फ भाई बनाया,बाकि रिश्तों में कुछ विशेष उपलब्धि कर प्राप्त हो सकी । इस बार रक्षाबंधन के बाद से भाई लोग बहन को गिफ्ट देना शुरू किये तो आते-आते करोड़ों रुपये बैंक अकॉउंट में आ गए । अब विरोधियों की बुरी नजर से कौन बचाये ,यह सम्बन्ध है । विरोधी पार्टी नहीं बना पाए तो बहुजन के अकॉउंट को नजर लगा दिए और सीबीआई इस पवित्र रिश्ते में आये पवित्र धन की जाँच करने लगी और बहन जी को नये साल में बेवजह झटका लग गया । बहन जी के बाद जो सबसे बेहतरीन काम हो रहा है वो माँ-बेटे की पार्टी में हो रहा है ।बेटा आजकल बोलने की ट्रेनिंग ले रहा है और काफी हद तक सफल है ,नये साल बेटे के लिए उपलब्धि वाला हो ऐसा हम भी उम्मीद करते हैं । हमारे बड़े लोग कहते हैं बहुत से लोगों की किस्मत विवाह के बाद खुलती है । शायद इस बेटे के साथ भी ऐसा ही हो मगर माता जी का ध्यान नहीं जा रहा है । पूरा ध्यान पार्टी पर है ।पार्टी पर इतना ध्यान दिया गया कि देश ही नहीं बल्कि ढाई साल में कई राज्यों में पार्टी का बंटाधार हो गया । माता जी थोड़ा बेटे पर ध्यान दे दें तो शायद पार्टी का भी कल्याण हो जाये और बेटे का भी । नये साल में बेटे का कुछ पता नहीं चला कि कहाँ पर हैं ,मीडिया लगी है तो कुछ निकाल कर लाएगी । क्योंकि मिडिया भी अपना काम बहुत ध्यान से करती है और जिसके पीछे लग जाती है उसको शिखर पर पहुँचा देती है । बिना राष्ट्रवादी पार्टी की चर्चा के नये साल की चर्चा करना बेकार हो जायेगा । वैसे तो भाजपा के लोग एक जनवरी को नये साल का शुभारम्भ मानते ही नहीं फिर भी कुछ लोग शुभकामनायें देते हुए दिखे । प्रधानमंत्री जी ने नोटबंदी में परेशान लोगों के आँसू फिर पोछे । वो हर भाषण में यही करते हैं । कुछ लॉलीपॉप भी दिए,अगर जनता तक पहुँच जाये तो यह साल पब्लिक के लिए बेहतरीन हो सकता है । उत्तर प्रदेश में अन्य पार्टी के नेताओं को प्रोत्साहित कर भाजपा ने नये साल का स्वागत किया ,उसे पता है कि अपने कम बाकि पार्टी के लोग अगर चाह जाये तो कम से कम उत्तर प्रदेश में उनका हैप्पी न्यू ईयर शानदार हो जायेगा । यह सब सफल करने के लिए वो कीचड़ में प्रयास कर रहें हैं ,क्योंकि कमल भी कीचड़ में ही खिलता है ।हाथी से बहुत से लोगों को उतार कर उनके हाथ में कमल पकड़ा चुकी है और साइकिल पर भी नजर है । हाथ का पंजा तो वैसे ही आजकल ढीला है फिर भी भाजपा को कोई ढीलाढाला भी मिल जाये तो अपना लेती है । बहुत उदार है जिसे जनता के विकास से अधिक पार्टी का विकास पसंद है । इसलिए नये साल में नये-नये विकास को अपनाती जा रही है । बिहार के मुख्यमंत्री पर भी डोरे डाले जा रहे हैं ,कारण कुछ भी हो । बिहार में दो भाई बड़े प्रेम से सरकार चला रहे हैं ,प्रेम इतना की एक दूसरे की बुराई मुँह पर नहीं कर पाते हैं । दोनों भाइयों के बीच अगर दरार आती है तो भगवान भाजपा को कभी माफ़ नहीं करेंगे । ये बात अलग है कि भाजपा की वजह से ही एक दूसरे का गर्दन काटने वाले दोनों भाई आपस में गले मिले हैं । खैर राजनैतिक पार्टियों का यह नया साल कैसा होगा ,इसके बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी । उत्तर प्रदेश सहित बहुत से राज्य में चुनाव हैं ,परिणाम बताएगा कि यह किसका साल है ,किसके लिए काल है और कौन-कौन होने वाला बेहाल है ।

Thursday, January 5, 2017

साइकिल की घंटी किसको मिलेगी

साइकिल बहुत अच्छी चल रही थी । हाथी को टक्कर देने के मूड में थी ,दे भी देती मगर जो कुछ हुआ उससे साइकिल की आत्मा को बहुत ठेस पहुँच । हाथी से मुकाबला होने से पहले साइकिल के सारे सपने टूट गए और अब साइकिल भी टूटने के कगार पर है । जिन लोगों को साइकिल सबसे अधिक प्रिय था वहीं लोग उसके टुकड़े करने पर तुले है ।अभी तक तो मुलायम सिंह जी साइकिल की हैंडिल अपने हाथ में होने का दावा कर रहे हैं मगर रामगोपाल और अखिलेश पैडल पर पैडल मारे जा रहे हैं ।शिवपाल यादव टायर तो थे पर अब हवा कम होती जा रही है ।आजम खान चैन बनकर आये थे तो थोड़ी आगे बढ़ी थी । अब जाने क्या होगा अमर सिंह बार-बार ब्रेक बन जा रहे हैं ।साइकिल से ब्रेक हटाने का फैसला हो गया ताकि सरपट दौड़े पर हैंडिल जिसके हाथ में है उसके रास्ते अलग है और पैडल मारने वाले उसे दूसरे रास्ते पर के जाना चाहते हैं । समाजवादियों की प्रिय साइकिल टूटेगी तो सभी को दुःख होगा ,उसका सारा पार्ट महत्वपूर्ण समाजवादियों के हिस्से में आएगा । पार्टियाँ बनेगी और फिर चुनाव का नजारा कुछ अलग ही होगा । एक दो दिन में फैसला आ जायेगा पर मैं तो इसी सोच में डूबा हूँ कि अगर साइकिल टूट गयी तो तो घंटी किसके हिस्से में आएगी  

Tuesday, January 3, 2017

पतझड़ से सीख

सरला नारायण ट्रस्ट द्वारा दिसंबर माह की चुनी गयी प्रशंसनीय रचना | 



पतझड़ का आभाष न होगा ।
रे मन फिर मधुमास न होगा । ।

पतझड़ जीवन का दर्शन है
एकाकीपन की अनुकृति है
पहले खो कर फिर पाता है
पतझड़ से पोषित प्रकृति है

खोने का यदि मर्म न जाना
तो पाकर उल्लास न होगा ।रे मन फिर.......

पत्ते पेड़ों से झर-झर कर
सृष्टि चक्र को गति देते हैं
नए फूल फिर से आकर के
पेड़ों का दुःख हर लेते हैं

क्रंदन का अनुभव न लिया तो
हँसने का अभ्यास न होगा ।रे मन फिर.......

प्रेम कठिन है, सर्व विदित है
किन्तु चाह सबकी रहती है
आँसू,विरह,वेदना,पीड़ा
स्नेहिल ह्रदय वास करती है

यदि ये सब दुःख नहीं मिले तो
प्रेम हुआ, विश्वास न होगा ।रे मन फिर.......

जीवन का भी ढल जाना है
पतझड़ हमें बताता है यह
नवनिर्माण नये जीवन का
कला हमें समझाता यह

सीखोगे पतझड़ से जीना
तो मन कभी उदास न होगा  ।रे मन फिर.......



-----विनोद पांडेय

Friday, December 30, 2016

राम के नहीं हुए ,रामगोपाल के कैसे होते

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जिस बात का आकलन कर रहे थे वही सब हुआ । उत्तर प्रदेश की राजनीति में भूचाल आ गया । पिता जी ने बेटे को पार्टी से निकाल कर सिद्ध कर दिया कि अभी वो बूढ़े नहीं है । कितना सोच-विचार किये नेताजी जी ,ये तो पता नहीं पर जनता का मूड कुछ और है ,जो दिखाई दे रहा है । रामगोपाल और अखिलेश समाजवादी पार्टी ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की बुद्धजीवी जनता की पसंद थे । टिकट बँटवारे को लेकर शुरू हुई लड़ाई इतना भयंकर रूप ले लेगी किसी ने सोचा नहीं था । शिवपाल और मुलायम जी का अलग कदम क्या होगा ये तो पता नहीं पर जनता अखिलेश को चाहती है क्योंकि इस बार उत्तर प्रदेश में कुछ काम बोला है । यह हताशा भी हो सकती है नेताजी की क्योंकि पार्टी की छवि बदल कर काम वाली हो रही है और जो दबंगई वाली छवि थी वो कम हो रही है । नेताजी को भक्त पसंद हैं पर युवा जो विकास चाहती है अखिलेश को कुछ हद तक पसंद करती है,कुछ लोग आशंका व्यक्त कर रहें हैं कि यह अखिलेश की छवि सुधारने के लिए राजनीति है पर ऐसी राजनीति सकारात्मक नहीं होती ,अखिलेश की छवि तो सुधर जाएगी पर पार्टी बहुत खतरनाक मोड़ पर आ जाएगी । पार्टी के दो फाड़ होने पर फायदा तो विरोधियों को ही होगा । मुलायम जी समझ नहीं रहें है या उन्हें गुमराह किया जा रहा है । 

सारे समाजवादी पार्टी कहते हैं "मन से मुलायम है इरादे से हैं लोहा " अतः फायदा उठाने वाले लोग लोहा गरम देखकर हथौड़ा मार दिए ,अब हालात और गड़बड़ हो गया है । मुलायम की छवि कुछ अलग रही ,विचारधारा भी कुछ कुछ अलग है ऐसे में वो विकास  और साफ़ राजनीति की बात कर रहें अखिलेश  और रामगोपाल को कितना पसंद करते इसलिए आज उन्होंने अपना फैसला सुना दिया । अब देखते जाइये और क्या क्या होता है उत्तर प्रदेश में । 



कहते थे सब लोग नाम से मुलायम हैं 
निकला बड़ा कठोर नाम का नहीं हुआ 

काम बोलने लगा तो अखिलेश को हटाया 
वही जो कभी भी किसी काम का नहीं हुआ 

उसके लिए तो सब आलू और बैगन हैं 
भून दिया था जो शालिग्राम का नहीं हुआ 

रामगोपाल का भला वो कैसे होता बोलो 
आदमी जो भगवान राम का नहीं हुआ 

---विनोद पांडेय